देश की सियासत में बढ़ रहा तानाशाही का दबाव लोकतंत्र के लिए घातक : राणा

Jun 28, 2020 18:49 |
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हमीरपुर 28 जूनदेश व प्रदेश की सियासत अब अंग्रेजी हुकूमत के दौर में पहुंच रही है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि अब देश की राजनीति अंग्रेजी हुकूमत का अनुसरण करते हुए उसके नक्शे चिन्हों पर चलने लगी है। यह बात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के राज्य उपाध्यक्ष एवं विधायक राजेंद्र राणा ने यहां जारी प्रेस बयान में कही है। राणा ने कहा कि निरंतर खतरनाक होते जा रहे सियासत के इस दौर में उन लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन होने लगा है, जिन्हें स्थापित करने के लिए देश के लाखों लोगों ने कांग्रेस पार्टी का सहयोग करते हुए अपनी कुर्बानियां देकर इस देश को दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक ताकत बनाया था, जहां हर नागरिक, हर धर्म, हर समुदाय व हर विपक्षी पार्टी को अपनी आवाज बुलंद करने का मौलिक अधिकार मौजूद था, लेकिन वर्तमान में देश को निजी एजेंडे पर चलाने की साजिशों व सियासत को मार्केटिंग के तौर तरीके से चलाने की स्वार्थी आदतों ने अब इन अधिकारों का हनन कर लिया है। इतिहास गवाह है कि अंग्रेजी हुकूमत में जब कोई हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाता था तो उसको देशद्रोह के मामलों में सलाखों के पीछे धकेल कर उसकी आवाज को दफन कर दिया जाता था। राणा ने कहा कि मौजूदा दौर में बीजेपी के शासन में भी फिर वही दौर दोहराया जा रहा है। मंहगाईयों और भाजपाईयों से त्रस्त देश के नागरिक अब जब कोई आवाज व्यवस्था में फैली अव्यवस्था के खिलाफ उठाते हैं तो उन्हें देशद्रोही करार दिया जाता है। बीजेपी के 6 साल के शासन में जिस भी नागरिक, मीडिया या संस्था ने अव्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई है तो उसे देशद्रोही करार देते हुए, सीबीआई, इंकम टैक्स और ईडी को उसके पीछे लगाकर तरह-तरह के मानसिक यातनाएं देकर जनता की आवाज को दबाने का क्रम जारी है। राणा ने कहा कि लोकतंत्र के लिए घातक व खतरनाक इस सियासत के दौर में अब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत पर निरंतर खतरा मंडरा रहा है। राणा ने कहा कि सत्तासीन बीजेपी यह न भूले कि जब-जब देश के लोगों को अनैतिक तरीकों से दबाने व मिटाने की सियासत शुरू हुई है, तब-तब उस सियासत का हश्र वही हुआ है जो अंग्रेजी हुकूमत का हुआ था। हर तानाशाही के दौर का अंत निश्चित है। आलोचना सरकार की समझ का आईना होता है, लेकिन जब सरकार जनता व विपक्षी पार्टियों की आलोचना पर दुश्मनों जैसा व्यवहार करने पर आमादा होती है तो सत्ता की मीनारें ध्वस्त होने की ओर अग्रसर होती हैं। सियासत में झूठ पर झूठ लोकतंत्र के लिए कभी भी हितकारी नहीं हो सकता है। सियासत सेवा, साधना व संकल्प की नींव पर चलती है लेकिन सियासत को जब कोई निजी एजेंडे व मार्केटिंग के तौर पर चलाना चाहता है तो वह लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाती है। राणा ने कहा कि रईसों व सियासतदानों की जुगलबंदी देश के आम नागरिकों के लिए खतरनाक साबित हो रही है और यह सियासत की मार्केटिंग की ही मिसाल है कि जो रईस व बड़े चेहरे यूपीए के कार्यकाल में पेट्रोल-डीजल की 1 से 2 रुपए कीमत बढ़ जाने पर  ट्वीट पर ट्वीट करते हुए यूपीए सरकार को निशाने पर रखते थे, वह बड़े चेहरे अब पेट्रोल-डीजल की कीमतें सामान होनें व 11 रुपए बढ़ जाने तक पर भी खामोश हैं। जो कि यह बता रहा है कि बीजेपी की सियासत में देश के बड़े चेहरों को सियासत व सत्ता की मार्केटिंग के लिए एक साजिश के तहत प्रयोग किया जाने लगा है। राणा ने कहा कि अगर तानाशाही व आम आदमी की आवाज दबाने व मिटाने का यह सिलसिला ऐसे ही बदस्तूर जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं कि जब देश की जनता का लोकतंत्र से भरोसा उठ जाएगा और सियासत में साजिशबाजों व मार्केटिंग का बोलबाला होगा।