महाराष्ट्र के मौजूदा सियासी ड्रामे जैसे  घटनाक्रम में भजन लाल को मिली थी सत्ता

महाराष्ट्र के मौजूदा सियासी ड्रामे जैसे  घटनाक्रम में भजन लाल को मिली थी सत्ता

43 वर्ष पूर्व   28 जून के ही दिन भजन लाल पहली बार बने थे हरियाणा के मुख्यमंत्री


 
 चंडीगढ़ –

हरियाणा की राजनीति में एक समय था जब  तीन  लालों – बंसी लाल, देवी लाल और भजन लाल का  वर्चस्व होता था . 1 नवंबर, 1966 को तत्कालीन संयुक्त पंजाब राज्य से अलग होकर जब हरियाणा  देश का नया प्रदेश बना, तो एक एक कर  तीनो ही प्रदेश  के मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहे थे. आज तीनों  इस संसार में नहीं है. अप्रैल, 2001 में देवी लाल, मार्च, 2006 में बंसी लाल और जून, 2011 में भजन लाल का निधन हो गया था.

बहरहाल, पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने प्रदेश के सियासी  इतिहास के  विषय में एक रोचक जानकारी देते हुए  बताया  कि  43 वर्ष पूर्व 28 जून 1979 को उपरोक्त तीनो लालों में से एक भजन लाल ने पहली बार मुख्यमंत्री बनकर प्रदेश की सत्ता संभाली थी. मुख्यमंत्री बनने से  पूर्व भजनलाल हालांकि वर्ष 1970 से 1975 तक मुख्यमंत्री   बंसी लाल की कांग्रेस सरकार में और वर्ष 1978 से मुख्यमंत्री  देवी लाल की जनता पार्टी सरकार में मंत्री पद पर रह चुके थे.  

उन्होंने आगे बताया कि हालांकि  प्रदेश की  चौथी  विधानसभा के   आम चुनाव, जो  जून, 1977 में सम्पन्न  हुए थे एवं  जिसमें प्रदेश के   मतदाताओं, जो तत्कालीन  प्रधानमंत्री रहीं  इंदिरा गाँधी द्वारा  जून, 1975 से मार्च, 1977 तक अर्थात 21 महीनों देश में  आपातकाल  (इमरजेंसी) लगाने से बुरी तरह  त्रस्त और ग्रस्त हो चुके  थे जिसके लिए  वह  कांग्रेस पार्टी को सबक सीखना चाहते थे, ने  उन विधानसभा  चुनावों में  जनता पार्टी, जो कांग्रेस विरोधी पार्टियों का संयुक्त गठबंधन था,  को प्रदेश की  90 विधानसभा सीटों में से रिकॉर्ड 75 सीटों पर जीत  दिलवाई. उस आम चुनाव में राव बीरेंद्र सिंह की विशाल हरियाणा पार्टी को पांच सीटें  जबकि कांग्रेस को केवल 3 सीटें ही मिली थी जबकि 7 सीटों पर निर्दलीय विधायक जीते थे.  भजन लाल ने उन चुनावों में हिसार ज़िले के  आदमपुर हलके से लगातार तीसरी बार जीत  हासिल की थी. उस समय वह बाबू जगजीवन राम की पार्टी कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी (सीएफडी) के  सदस्य थे जिस पार्टी से उन चुनावों में  कुल 3 ही विधायक बने थे.

हेमंत ने बताया कि हालांकि आरम्भ में 21 जून 1977 को जब हरियाणा में चौधरी देवी लाल, जो तत्कालीन भारतीय लोक दल (बीएलडी) के वरिष्ठ नेता थे,  प्रदेश में पहली जनता पार्टी सरकार के मुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने भजन लाल, जिनकी पार्टी  सीएफडी हालांकि जनता पार्टी का ही हिस्सा थी, को  प्रदेश सरकार में मंत्री नहीं बनाया गया था. सत्ता सँभालने के कुछ ही महीनों  बाद देवी लाल को न केवल उनकी पार्टी बीएलडी के  बल्कि सत्ताधारी जनता पार्टी के शेष   घटक दलों के विधायकों के  बगावती तेवर झेलने पड़े क्योंकि हर विधायक मंत्री पद   अथवा सरकारी बोर्ड/निगम आदि के चेयरमैन सरीखे किसी  मलाईदार पोस्ट  पर आसीन होना  चाहता था.

इसी कारण देवी लाल को सत्ता सँभालने के दो वर्षो में कई बार न केवल उनके मंत्रिपरिषद में फेरबदल करना पड़ा था बल्कि  विधानसभा सदन में उनके विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव का सामना और विश्वास प्रस्ताव तक हासिल करना पड़ा था. तब जनता पार्टी के  केंद्रीय नेतृत्व ( उस समय देश के प्रधानमंत्री  मोरारजी देसाई थे ) से देवी लाल के रिश्तों  में भी उतार चढ़ाव आता रहा था. बहरहाल, हालांकि इसी दौरान वर्ष 1978 में विधायक भजल लाल को  देवी लाल ने मंत्रिमंडल में शामिल तो कर लिया था   परन्तु संभवत: तक तक भजन लाल की आकांक्षा मात्र  मंत्री बनने से ऊपर पहुंच  चुकी थी.  

हेमंत ने बताया कि  जून, 1979 में जब तत्कालीन जनता पार्टी के  केंद्रीय नेतृत्व ने हरियाणा के मुख्यमंत्री देवी लाल के विरूद्ध पार्टी विधायकों के बगावती सुरो को देखते  हुए उन्हें एक बार फिर  विधानसभा सदन में विश्वास मत हासिल करने का निर्देश दिया जो उन्होंने 26 जून 1979 तक करना था. इसी बीच   राजनीति के पीएचडी कहे जाने वाले भजन लाल ने  ऐसी राजनीतिक बिसात बिछाई कि उससे कुछ दिन पूर्व ही विधानसभा में  जनता पार्टी के  साढ़े तीन दर्जन से ऊपर असंतुष्ट  विधायक कई अलग अलग गुटों में बंटकर   भारत भ्रमण पर देश के अलग अलग हिस्सों में निकल गए.    

हेमंत ने बताया कि उपरोक्त जून, 1979 का हरियाणा में घटनाक्रम वैसा  ही  था जैसा आजकल महाराष्ट्र में सियासी ड्रामा चल रहा है जिसमें प्रदेश में सत्तासीन शिवसेना के बागी विधायक, जो मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की कार्यशैली से असंतुष्ट है, वह एकनाथ शिंदे ने नेतृत्व में पहले सूरत और अब गुवाहाटी में डेरा डाले हुए है एवं जिनकी संख्या नित प्रतिदिन बढ़ती जा रही है.

बहरहाल, चूँकि तत्कालीन मुख्यमंत्री देवी लाल सदन में विश्वास प्रस्ताव हासिल करने हेतु भरसक प्रयासों बावजूद  पार्टी के बागी विधायकों को मनाने के लिए उनसे   संपर्क तक  नहीं साध पाए थे जिस कारण हारकर  उन्हें विश्वास प्रस्ताव से एक  दिन पूर्व ही 25 जून  को मुख्यमंत्री  पद से त्यागपत्र देना पड़ा था. इसके  तीन दिनों बाद 28 जून  1979  भजन लाल  हरियाणा प्रदेश के  मुख्यमंत्री बने  जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई  और केंद्रीय  मंत्री चाँद राम, जो हरियाणा की सिरसा सीट से लोकसभा सांसद थे,  का पूरा समर्थन था.  

हेमंत ने बताया कि उसके  छः माह बाद जनवरी, 1980 में  जब इंदिरा गाँधी फिर  देश की प्रधानमंत्री बनीं, तो भजन लाल ने मौके की नज़ाकत को देखते  हुए उनकी शरण में जाकर पूरी प्रदेश सरकार को  जनता पार्टी से कांग्रेस  में पाला-बदल कर लिया था.    

 

 

 

 

 

 

 

 

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