आपदा, संविधान और पंचायत चुनाव: मुख्यमंत्री सुक्खू का कठिन लेकिन जिम्मेदार फैसला

हिमाचल प्रदेश इस समय केवल एक राजनीतिक बहस से नहीं, बल्कि एक गहरे प्रशासनिक और मानवीय संकट से गुजर रहा है। राज्य के कई हिस्से अभी भी प्राकृतिक आपदाओं के घाव झेल रहे हैं—कहीं भूस्खलन, कहीं सड़कें टूटी हुई, कहीं पेयजल और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं तक पूरी तरह बहाल नहीं हो पाई हैं। ऐसे हालात में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का यह कहना कि पंचायत चुनाव कराना फिलहाल व्यावहारिक और जिम्मेदार कदम नहीं होगा, केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि जमीनी सच्चाइयों से उपजा निर्णय है।

राज्य सरकार ने पंचायत चुनावों को लेकर हाईकोर्ट के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। इसके पीछे सरकार का तर्क साफ है—राज्य में आपदा प्रबंधन अधिनियम अभी लागू है और जब तक हालात सामान्य नहीं हो जाते, तब तक चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाना न केवल प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डालेगा, बल्कि आपदा राहत और पुनर्वास के कार्यों को भी प्रभावित करेगा।

मुख्यमंत्री सुक्खू का कहना है कि लोकतंत्र केवल मतदान कराने का नाम नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी सरकार की जिम्मेदारी है कि हर नागरिक सुरक्षित हो, बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों और चुनाव निष्पक्ष व शांतिपूर्ण माहौल में हों। जब कई पंचायत क्षेत्रों में सड़क संपर्क तक बहाल नहीं हुआ है, सरकारी मशीनरी राहत कार्यों में लगी है और ग्रामीण आबादी अभी भी अस्थिर हालात से जूझ रही है, तब चुनाव कराना जमीनी हकीकत से आंखें मूंदने जैसा होगा।

सरकार का यह भी तर्क है कि राज्य निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है, लेकिन आपदा प्रबंधन अधिनियम भी संसद द्वारा बनाया गया कानून है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। ऐसे में दोनों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है और यही कारण है कि राज्य सरकार ने अंतिम निर्णय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सरकार का रुख साफ है—चुनाव होंगे, लेकिन जल्दबाजी में नहीं; पहले हालात सामान्य होंगे, फिर लोकतांत्रिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल विपक्ष की भूमिका पर भी खड़ा होता है। हिमाचल प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल भाजपा लगातार पंचायत चुनावों को लेकर सरकार पर दबाव बना रही है। लेकिन यही भाजपा तब चुप रही, जब राज्य आपदा के बाद आर्थिक मदद और विशेष पैकेज के लिए संघर्ष कर रहा था। हिमाचल प्रदेश के पास संसद में छह सांसद हैं—चार लोकसभा और दो राज्यसभा से। लेकिन न लोकसभा में और न ही राज्यसभा में इन सांसदों ने राज्य के लिए जोरदार तरीके से आर्थिक पैकेज की मांग उठाई।

यह विडंबना ही है कि जिस राज्य ने वर्षों तक भाजपा को समर्थन दिया, उसी राज्य के संकट के समय उसके सांसदों की आवाज संसद में सुनाई नहीं दी। विपक्ष का यह रवैया इस सवाल को जन्म देता है कि क्या पार्टी की केंद्रीय राजनीति और नेतृत्व राज्य से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं? क्या हिमाचल प्रदेश केवल चुनावी मंच बनकर रह गया है?

मुख्यमंत्री सुक्खू ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि उनकी सरकार राजनीति से पहले राज्य के हित को रखती है। सीमित संसाधनों और गंभीर आर्थिक चुनौतियों के बावजूद सरकार राहत, पुनर्निर्माण और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में जुटी है। राज्य पर पहले से भारी कर्ज का बोझ है, राजस्व के स्रोत सीमित हैं और केंद्र से अपेक्षित सहायता समय पर नहीं मिल पाई है। ऐसे में हर फैसला सोच-समझकर लेना सरकार की मजबूरी भी है और जिम्मेदारी भी।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंचायत चुनावों को लेकर चल रही यह बहस केवल चुनाव की नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन, आपदा प्रबंधन और संघीय ढांचे की भी है। मुख्यमंत्री सुक्खू इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाकर यह संदेश देना चाहते हैं कि राज्य सरकार कानून और संविधान के दायरे में रहकर ही काम कर रही है और किसी भी फैसले में जल्दबाजी नहीं करना चाहती।

वहीं, विपक्ष पर यह आरोप लगातार गहराता जा रहा है कि वह केवल राजनीति की रोटियां सेंक रहा है। राज्य के आर्थिक संकट, आपदा से उबरने की जरूरत और जनता की पीड़ा के बजाय उसका पूरा फोकस सरकार को घेरने और सियासी लाभ उठाने पर है। यह भूल जाना कि वे भी हिमाचल प्रदेश से ही आते हैं, विपक्ष की राजनीति पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।

आज हिमाचल प्रदेश को नारेबाजी से ज्यादा सहयोग की जरूरत है—केंद्र से आर्थिक सहायता की, संसद में मजबूत आवाज की और राज्य हितों को दलगत राजनीति से ऊपर रखने की। मुख्यमंत्री सुक्खू का रुख यही दर्शाता है कि फिलहाल प्राथमिकता चुनाव नहीं, बल्कि राज्य को संकट से निकालना है।

आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि पंचायत चुनाव कब और कैसे होंगे। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात साफ कर दी है—हिमाचल प्रदेश की राजनीति अब केवल सत्ता और विपक्ष की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और अवसरवाद के बीच की लड़ाई बन चुकी है।