शिमला,
रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट (आरडीजी) को लेकर हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार और केंद्र के बीच चल रही सियासी खींचतान के बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री और हमीरपुर से सांसद अनुराग सिंह ठाकुर ने मुख्यमंत्री के आरोपों को तथ्यहीन बताते हुए एक विस्तृत प्रस्तुति के जरिए केंद्र सरकार का पक्ष सामने रखा। अनुराग ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस सरकार प्रदेश को गुमराह कर रही है और अपने वित्तीय कुप्रबंधन की जिम्मेदारी केंद्र पर डालने की कोशिश कर रही है, जबकि 16वें वित्त आयोग के तहत हिमाचल को पहले से अधिक संसाधन मिले हैं।
अनुराग ठाकुर ने स्पष्ट किया कि रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट कोई स्थायी व्यवस्था नहीं थी, बल्कि यह एक अस्थायी और संक्रमणकालीन सहायता थी। उन्होंने कहा कि 16वें वित्त आयोग ने सामान्य आरडीजी की सिफारिश इसलिए नहीं की, क्योंकि कई राज्यों में, जिनमें हिमाचल प्रदेश भी शामिल है, लगातार कमजोर कर प्रयास और उच्च प्रतिबद्ध राजस्व व्यय देखने को मिला। आयोग का मानना रहा कि लंबे समय तक आरडीजी जारी रखना सुधारों के बजाय गलत प्रोत्साहन पैदा करता है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार जिस ‘अन्यायपूर्ण कटौती’ की बात कर रही है, वह वास्तविकता से परे है। 16वें वित्त आयोग ने हिमाचल प्रदेश का विभाज्य कर पूल में हिस्सा 15वें वित्त आयोग के 0.830 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.914 प्रतिशत कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप हिमाचल की पोस्ट-डेवोल्यूशन प्राप्ति 2025-26 के बजट अनुमान में लगभग ₹11,561.66 करोड़ से बढ़कर ₹13,949.97 करोड़ हो गई है। यानी केंद्र से कर डेवोल्यूशन के रूप में लगभग ₹2,388 करोड़ की शुद्ध वृद्धि हुई है।
अनुराग ठाकुर ने बताया कि 15वें वित्त आयोग के दौरान आरडीजी को कोविड-19 के बाद राज्यों को संभालने के लिए फ्रंट-लोडेड किया गया था और इसका उद्देश्य 2025-26 तक राजस्व घाटे को लगभग शून्य पर लाना था। लेकिन 14वें और 15वें वित्त आयोग के तहत बड़े पैमाने पर आरडीजी मिलने के बावजूद कई राज्यों में वास्तविक राजस्व घाटा कम नहीं हुआ। इसी कारण 16वें वित्त आयोग ने सामान्य आरडीजी को जारी रखना उचित नहीं समझा।
उन्होंने यह भी कहा कि मोदी सरकार राज्यों के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं करती। 16वें वित्त आयोग के नए फॉर्मूले के तहत कई विपक्षी शासित राज्यों को भी लाभ हुआ है। आयोग ने क्षैतिज पुनर्वितरण के मानदंडों में बदलाव करते हुए जनसंख्या और जनसांख्यिकीय प्रदर्शन का भार बढ़ाया, जीडीपी में योगदान के लिए 10 प्रतिशत वेटेज जोड़ा और क्षेत्रफल के भार को कम किया। इससे कुछ राज्यों को अधिक और कुछ को कम लाभ हुआ, लेकिन इसे किसी भी तरह से पक्षपातपूर्ण नहीं कहा जा सकता।
हिमाचल और उत्तराखंड की तुलना करते हुए अनुराग ठाकुर ने कहा कि दोनों पर्वतीय राज्यों के वित्तीय आंकड़ों में स्पष्ट अंतर है, जिसने आयोग के निर्णय को प्रभावित किया। हिमाचल का स्वयं का कर प्रयास 2023-24 में जीएसडीपी का लगभग 5.6 प्रतिशत रहा, जबकि उत्तराखंड में यह करीब 6.1 प्रतिशत था। वहीं हिमाचल का कुल राजस्व व्यय जीएसडीपी का लगभग 21 प्रतिशत रहा, जो उत्तराखंड के करीब 15 प्रतिशत के मुकाबले कहीं अधिक है। इससे यह स्पष्ट होता है कि हिमाचल में आवर्ती खर्च और प्रतिबद्धताएं ज्यादा हैं, जिससे विकासात्मक व्यय के लिए सीमित गुंजाइश बचती है।
उन्होंने बताया कि हिमाचल प्रदेश का 2023-24 में राजकोषीय घाटा जीएसडीपी का लगभग 5.3 प्रतिशत और राजस्व घाटा करीब 2.6 प्रतिशत रहा, जबकि उत्तराखंड ने करीब 2.5 प्रतिशत का राजकोषीय घाटा और 1.1 प्रतिशत का राजस्व अधिशेष दर्ज किया। इसके अलावा हिमाचल की बकाया देनदारियां जीएसडीपी की लगभग 42.8 प्रतिशत तक पहुंच गई हैं, जबकि उत्तराखंड में यह करीब 25.5 प्रतिशत है। उच्च ऋण बोझ के कारण ब्याज भुगतान बढ़ता है और वित्तीय लचीलापन कम होता है।
अनुराग ठाकुर ने यह भी कहा कि हिमाचल में कुल व्यय के मुकाबले पूंजीगत व्यय का हिस्सा अपेक्षाकृत कम है, जिससे संकेत मिलता है कि बजट का बड़ा भाग वेतन, पेंशन और ऋण सेवा जैसे राजस्व खर्चों में चला जाता है, न कि उत्पादक निवेश में। उनके अनुसार, यही वे संरचनात्मक कमजोरियां हैं, जिनके चलते 16वें वित्त आयोग ने नियमित आरडीजी को जारी रखना उचित नहीं समझा।
उन्होंने वित्त आयोगों के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले के आयोगों में आरडीजी को सीमित राज्यों तक रखा गया था। 14वें वित्त आयोग में इसे दोबारा बढ़ाया गया, 15वें वित्त आयोग में कोविड के बाद इसे अस्थायी ब्रिज ग्रांट के रूप में दिया गया, लेकिन 16वें वित्त आयोग ने इसे स्थायी समाधान मानने से इनकार कर दिया। आयोग ने इसके बजाय लक्षित सहायता और बढ़े हुए कर डेवोल्यूशन को प्राथमिकता दी है।
अपनी बात के अंत में अनुराग सिंह ठाकुर ने हिमाचल प्रदेश की जनता से अपील की कि वे कांग्रेस के दावों से भ्रमित न हों। उन्होंने कहा कि आंकड़े साफ बताते हैं कि केंद्र सरकार ने हिमाचल के साथ कोई अन्याय नहीं किया है। असली चुनौती यह है कि राज्य वित्तीय अनुशासन कैसे बहाल करे, कर संग्रह कैसे बढ़ाए और भविष्य के लिए उत्पादक निवेश कैसे सुनिश्चित करे। उनके अनुसार, यही हिमाचल प्रदेश की स्थायी समृद्धि का रास्ता है।





