सप्तऋषि सोनी।
हर साल सर्दियों के मौसम में, जब हरियाणा के खेतों में सरसों पीली चादर बिछा देती है और हवा में उत्सव की खुशबू घुल जाती है, तब सूरजकुंड केवल एक स्थान नहीं रहता, बल्कि संस्कृति का जीवंत उत्सव बन जाता है। सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला आज केवल एक मेला नहीं, बल्कि भारत की लोक परंपराओं, प्रशासनिक क्षमता, राजनीतिक दृष्टि और जनभागीदारी का ऐसा संगम है, जिसे देश ही नहीं, दुनिया पहचानती है।
यह कहानी केवल हस्तशिल्प और हथकरघा की नहीं है, बल्कि उस सोच की है जिसने संस्कृति को संरक्षण, रोज़गार और अंतरराष्ट्रीय संवाद का माध्यम बनाया।
शुरुआत: संस्कृति को बचाने की एक दूरदर्शी सोच
सूरजकुंड मेले की शुरुआत वर्ष 1987 में उस समय हुई, जब तेज़ी से बदलते सामाजिक-आर्थिक माहौल में पारंपरिक शिल्प और लोक कलाएं हाशिये पर जा रही थीं। हरियाणा सरकार ने यह महसूस किया कि यदि कारीगरों को बाज़ार और सम्मान नहीं मिला, तो सदियों की परंपराएं समाप्त हो जाएंगी।
दसवीं शताब्दी के ऐतिहासिक सूरजकुंड सरोवर को इस आयोजन के लिए चुना गया, ताकि यह मेला केवल अस्थायी आयोजन न होकर इतिहास और परंपरा से जुड़ा स्थायी मंच बने। शुरुआत से ही इसका उद्देश्य स्पष्ट था—ग्रामीण कारीगरों को सीधा मंच देना और संस्कृति को जीवित रखना।
मेले की आवश्यकता क्यों पड़ी
सूरजकुंड मेला शुरू करने के पीछे कई ठोस कारण थे।
पारंपरिक शिल्पों का संरक्षण, जो आधुनिक बाज़ार में जगह खो रहे थे।
कारीगरों को सीधा आर्थिक लाभ और पहचान देना।
देश-विदेश के बीच सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देना।
हरियाणा को पर्यटन और संस्कृति के मानचित्र पर स्थापित करना।
विविधताओं को एक मंच पर लाकर सामाजिक एकता को मज़बूत करना।
इन उद्देश्यों ने सूरजकुंड को साधारण मेले से अलग पहचान दी।
राजनीतिक इच्छाशक्ति: निरंतरता की मजबूत नींव
सूरजकुंड मेले की सबसे बड़ी ताकत इसकी निरंतरता रही है। सरकारें बदलीं, नीतियाँ बदलीं, लेकिन सूरजकुंड हर साल और अधिक भव्य रूप में सामने आया। यह दर्शाता है कि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सभी सरकारों ने इसे हरियाणा की सांस्कृतिक धरोहर माना।
इसे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देना और हर साल विशेष थीम देश की परंपरा शुरू करना भी इसी राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम है।
प्रशासन की भूमिका: योजना और अनुशासन
यदि राजनीतिक नेतृत्व ने दिशा दी, तो नौकरशाही ने उसे ज़मीन पर उतारा। प्रशासनिक अधिकारियों ने सूरजकुंड को केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा का विषय माना।
प्रशासन की प्रमुख भूमिकाएँ रही हैं—
कारीगरों का पारदर्शी चयन।
विभागों के बीच बेहतर समन्वय।
सुरक्षा, स्वच्छता और यातायात की सुदृढ़ व्यवस्था।
बुनियादी ढांचे का निरंतर विकास।
हर वर्ष पिछले अनुभवों से सीखकर व्यवस्था को और बेहतर बनाया गया।
आर्थिक दृष्टि से सफल मॉडल
सूरजकुंड मेला यह साबित करता है कि संस्कृति भी आर्थिक रूप से सशक्त हो सकती है। कारीगरों को यहाँ सीधा लाभ मिलता है, स्थानीय युवाओं को रोज़गार मिलता है और पर्यटन से राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।
अनेक कारीगरों के लिए सूरजकुंड में हुई बिक्री पूरे साल की आजीविका का आधार बनती है। साथ ही, बड़े ऑर्डर और अंतरराष्ट्रीय संपर्क भी यहीं से मिलते हैं।
जनस्वीकृति: मेले से परंपरा तक
सूरजकुंड अब केवल देखने जाने की जगह नहीं, बल्कि परिवारों की वार्षिक परंपरा बन चुका है। दिल्ली-एनसीआर सहित देशभर से लोग हर साल यहाँ आते हैं।
लोक संगीत, हस्तशिल्प, क्षेत्रीय व्यंजन और सुरक्षित माहौल ने इसे हर वर्ग के लिए आकर्षक बना दिया है। लोगों को यहाँ अपनी जड़ों से जुड़ने का अनुभव मिलता है।
अंतरराष्ट्रीय पहचान और थीम देश
थीम देश की परंपरा ने सूरजकुंड को वैश्विक पहचान दिलाई। अलग-अलग देशों के कलाकार और कारीगर यहाँ अपनी संस्कृति लेकर आते हैं, जिससे सूरजकुंड एक वैश्विक गांव जैसा बन जाता है।
यह सांस्कृतिक कूटनीति का ऐसा रूप है, जिसमें संवाद मंचों पर नहीं, बल्कि कला और संगीत के ज़रिये होता है।
राज्य-स्तरीय भागीदारी: एक भारत की झलक
भारत के लगभग सभी राज्यों की भागीदारी सूरजकुंड को “एक भारत” का जीवंत रूप देती है। हर राज्य की कला, वस्त्र और परंपराएँ यहाँ एक साथ देखने को मिलती हैं।
हरियाणा की पहचान बन चुका सूरजकुंड
समय के साथ सूरजकुंड हरियाणा की सांस्कृतिक पहचान बन गया है। इसने राज्य की छवि को नया आयाम दिया—एक ऐसा राज्य जो परंपरा को सहेजना जानता है और दुनिया से संवाद करना भी।
सरकार, प्रशासन और जनता—तीनों की साझेदारी
हरियाणा सरकार ने संरक्षक की भूमिका निभाई, प्रशासन ने व्यवस्थापक की और जनता ने आत्मा की। कारीगर, कलाकार, दर्शक और स्थानीय लोग—सब मिलकर सूरजकुंड को जीवंत बनाते हैं।
केवल मेला नहीं, सांस्कृतिक आंदोलन
सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला यह दिखाता है कि यदि सोच साफ हो और नीयत मज़बूत, तो संस्कृति केवल अतीत की वस्तु नहीं रहती, बल्कि वर्तमान और भविष्य का रास्ता बन जाती है।
यही कारण है कि सूरजकुंड हर साल केवल भीड़ नहीं जुटाता, बल्कि यादें, गर्व और पहचान भी रचता है—हरियाणा की मिट्टी से जुड़ी, और दुनिया के लिए खुली हुई।






