42.8 किलो गांजा बरामदगी मामले में 26 महीने बाद हाई कोर्ट से राहत, लंबी हिरासत और धीमे ट्रायल के आधार पर मोहित लाल को जमानत

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मादक पदार्थ की व्यावसायिक मात्रा की बरामदगी से जुड़े एक मामले में करीब 26 महीने से जेल में बंद मोहित लाल को नियमित जमानत दे दी है। अदालत ने माना कि 42.8 किलोग्राम गांजा बरामद होने का आरोप गंभीर है और ऐसे मामले में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट की धारा 37 के तहत जमानत के लिए कड़े मानदंड लागू होते हैं। हालांकि, मुकदमे की धीमी रफ्तार और आरोपी की लंबी न्यायिक हिरासत को देखते हुए अदालत ने उसकी रिहाई को उचित माना।

जस्टिस जसजीत सिंह बेदी की पीठ ने मोहित लाल की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए निर्धारित शर्तों के साथ उसे रिहा करने का आदेश दिया। मामला पलवल जिले के होडल थाने में 21 जून 2024 को दर्ज एफआईआर से संबंधित है। आरोपी पर वाहन के जरिए बड़ी मात्रा में गांजा ले जाने के मामले में एनडीपीएस एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की गई थी।

पुलिस के अनुसार, मामले में वाहन चालक अभिषेक और मोहित लाल को पकड़ा गया था। तलाशी के दौरान वाहन से कथित तौर पर 42.8 किलोग्राम गांजा बरामद किया गया। बरामद मात्रा को व्यावसायिक मात्रा की श्रेणी में माना गया, जिसके कारण आरोपी की जमानत याचिका पर सामान्य मामलों की तुलना में अधिक कठोर कानूनी कसौटियां लागू हुईं।

मोहित लाल की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उसे मामले में झूठा फंसाया गया है। बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि जांच के दौरान एनडीपीएस एक्ट की धारा 42 और 50 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। याचिका में यह भी बताया गया कि आरोपी का कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।

इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि सहआरोपित अभिषेक को पहले ही जमानत मिल चुकी है। बचाव पक्ष ने अदालत के समक्ष मोहित लाल की लंबी हिरासत और मुकदमे की धीमी प्रगति को भी प्रमुख आधार बनाया।

याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि मोहित लाल 21 जून 2024 से लगातार हिरासत में है। अभियोजन पक्ष ने मामले में कुल 32 गवाहों को सूचीबद्ध किया है, लेकिन सुनवाई की स्थिति यह है कि अब तक केवल एक गवाह की गवाही पूरी हो सकी है। बचाव पक्ष ने इसी आधार पर तर्क दिया कि मुकदमे के शीघ्र पूरा होने की संभावना दिखाई नहीं दे रही और आरोपी को अनिश्चित अवधि तक जेल में रखना न्याय के उद्देश्य के अनुरूप नहीं होगा।

राज्य सरकार ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए अदालत के सामने बरामद मादक पदार्थ की मात्रा और उसकी व्यावसायिक श्रेणी का हवाला दिया। अभियोजन पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि इतनी बड़ी मात्रा में मादक पदार्थ की बरामदगी के कारण एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के तहत आरोपी को जमानत देना आसान नहीं है। हालांकि, राज्य की ओर से यह भी स्वीकार किया गया कि मोहित लाल का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास सामने नहीं आया है।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि व्यावसायिक मात्रा में मादक पदार्थ की बरामदगी वाले मामलों में धारा 37 की कानूनी आवश्यकताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस प्रावधान के तहत अदालत को यह संतुष्ट होना होता है कि आरोपी के प्रथम दृष्टया दोषी न होने के उचित आधार मौजूद हैं और जमानत मिलने के बाद उसके दोबारा किसी अपराध में शामिल होने की संभावना नहीं है।

लेकिन अदालत ने इस कानूनी कठोरता के साथ आरोपी के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन पर भी विचार किया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए लंबी अवधि की हिरासत और मुकदमे में हो रही देरी को महत्वपूर्ण परिस्थितियों के रूप में देखा।

अदालत के सामने मुख्य सवाल केवल कथित अपराध की गंभीरता नहीं था, बल्कि यह भी था कि जब मुकदमे की सुनवाई बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रही हो तो आरोपी को कितने लंबे समय तक बिना अंतिम निर्णय के जेल में रखा जा सकता है। अदालत ने माना कि त्वरित सुनवाई का अधिकार संविधान के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा हुआ है।

इस मामले में 32 अभियोजन गवाहों में से केवल एक की गवाही होने और आरोपी के लंबे समय से जेल में रहने की स्थिति ने जमानत के फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अदालत ने संकेत दिया कि कुछ परिस्थितियों में मुकदमे में अत्यधिक देरी धारा 37 की कठोर शर्तों के बावजूद जमानत पर विचार करने का आधार बन सकती है।

हालांकि, हाई कोर्ट ने जमानत को बिना शर्त राहत के रूप में नहीं दिया। मोहित लाल की रिहाई पर कई शर्तें लगाई गई हैं। उसे प्रत्येक महीने संबंधित पुलिस थाने में उपस्थित होकर यह बताना होगा कि वह किसी अन्य आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं है। इसके अतिरिक्त उसे एक लाख रुपये की एफडीआर भी जमा करनी होगी।

इन शर्तों का उद्देश्य आरोपी की रिहाई के बाद उसकी गतिविधियों पर निगरानी बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना है कि वह न्यायिक प्रक्रिया से दूर न हो। अदालत ने स्पष्ट रूप से निर्धारित शर्तों के अधीन ही उसकी रिहाई का आदेश दिया है।

यह फैसला इस व्यापक कानूनी सवाल को भी सामने लाता है कि गंभीर अपराधों में कठोर जमानत प्रावधानों और आरोपी के त्वरित सुनवाई के संवैधानिक अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। एनडीपीएस मामलों में अदालतें मादक पदार्थों की तस्करी की गंभीरता को देखते हुए कड़े रुख के लिए जानी जाती हैं, लेकिन साथ ही लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों में आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न भी न्यायिक विचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहता है।

मोहित लाल को मिली जमानत का अर्थ मामले से आरोपों का समाप्त होना या आरोपी का दोषमुक्त होना नहीं है। मुकदमा अपनी कानूनी प्रक्रिया के अनुसार आगे चलेगा और आरोपों पर अंतिम निर्णय साक्ष्यों और सुनवाई के बाद ही होगा। फिलहाल हाई कोर्ट ने लंबी हिरासत, धीमी सुनवाई, आरोपी के कथित तौर पर आपराधिक इतिहास न होने और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए उसे शर्तों के साथ जेल से बाहर आने की अनुमति दी है।