हिमाचल के लैंड रेवेन्यू सेस फैसले से अंतरराज्यीय तनाव की आशंका, पंजाब पर बढ़ सकता है सालाना 200 करोड़ का अतिरिक्त बोझ



हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा जलविद्युत परियोजनाओं पर नया लैंड रेवेन्यू सेस लागू करने के फैसले ने उत्तर भारत की अंतरराज्यीय राजनीति और वित्तीय संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इस निर्णय का सीधा असर पड़ोसी राज्य पंजाब पर पड़ने की संभावना है, जहां सरकार को हर वर्ष करीब 200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ सकता है। यह मुद्दा केवल राजस्व या कर प्रणाली तक सीमित नहीं है, बल्कि संघीय ढांचे, राज्यों के आपसी संबंधों और केंद्र–राज्य वित्तीय संतुलन से भी जुड़ता नजर आ रहा है।

जानकारी के अनुसार हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य में स्थित जलविद्युत परियोजनाओं पर 2 प्रतिशत लैंड रेवेन्यू सेस लागू करने का फैसला लिया है। इस सेस के लागू होने से भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड (BBMB) के अंतर्गत संचालित तीन प्रमुख परियोजनाओं पर कुल मिलाकर 433 करोड़ रुपये से अधिक का सालाना अतिरिक्त वित्तीय भार बढ़ जाएगा। इस राशि को BBMB से जुड़े राज्यों—पंजाब, हरियाणा और राजस्थान—को साझा रूप से वहन करना होगा। इनमें सबसे अधिक असर पंजाब पर पड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है।

इस फैसले को लेकर BBMB ने हिमाचल प्रदेश सरकार के समक्ष औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई है। 3 जनवरी को हुई एक बैठक में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने यह स्पष्ट किया कि लैंड रेवेन्यू सेस राज्य की सभी जलविद्युत परियोजनाओं पर समान रूप से लागू किया जाएगा। यह रुख दर्शाता है कि राज्य सरकार इस निर्णय को केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि राजस्व बढ़ाने की दीर्घकालिक रणनीति के रूप में देख रही है।

गौरतलब है कि वर्ष 2023 में भी हिमाचल सरकार ने जल उपकर लगाया था, जिसे बाद में केंद्र सरकार ने अवैध करार दिया था। इसके बावजूद अब 12 दिसंबर 2025 को जारी नई अधिसूचना के जरिए लैंड रेवेन्यू सेस लागू किया गया है और इससे जुड़े राज्यों से आपत्तियां भी मांगी गई हैं। पंजाब सरकार ने 24 दिसंबर को अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि BBMB की परियोजनाएं व्यावसायिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि जनहित और राष्ट्रीय जरूरतों को ध्यान में रखकर स्थापित की गई थीं। साथ ही, भूमि अधिग्रहण के समय मुआवजा पहले ही दिया जा चुका है, ऐसे में दोबारा इस आधार पर कर लगाना उचित नहीं है।

पंजाब सरकार का यह भी तर्क है कि यदि किसी प्रकार का लैंड रेवेन्यू लगाया ही जाता है, तो वह केवल भूमि के वास्तविक मूल्य तक सीमित होना चाहिए, न कि पूरी परियोजना लागत पर। इस तर्क के पीछे यह चिंता भी है कि यदि यह सेस मौजूदा स्वरूप में लागू हुआ, तो बिजली की लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं और कृषि क्षेत्र पर पड़ेगा।

दूसरी ओर, हिमाचल प्रदेश सरकार के फैसले के पीछे राज्य की गंभीर वित्तीय स्थिति को भी एक अहम कारण माना जा रहा है। पहाड़ी राज्य होने के कारण हिमाचल की आय के सीमित स्रोत हैं, जबकि वेतन, पेंशन, बुनियादी ढांचे और सामाजिक योजनाओं पर खर्च लगातार बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू कई बार सार्वजनिक मंचों से यह आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्र सरकार राज्य को उसका वैध राजस्व हिस्सा समय पर नहीं दे रही है और न ही अपेक्षित वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। ऐसे में राज्य सरकार पर वैकल्पिक राजस्व स्रोत तलाशने का दबाव बढ़ता जा रहा है।

हालांकि, जानकारों का मानना है कि संघीय ढांचे में इस तरह के फैसले बिना व्यापक सहमति के लिए गए तो राज्यों के बीच रिश्तों में कड़वाहट बढ़ सकती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में वित्तीय संकट का समाधान आपसी संवाद, सहमति और केंद्र–राज्य सहयोग से निकालना अपेक्षित होता है। एक राज्य द्वारा लिए गए ऐसे कदम, जिनका सीधा आर्थिक असर दूसरे राज्यों पर पड़े, भविष्य में संवैधानिक और राजनीतिक टकराव का कारण बन सकते हैं।

आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के साथ-साथ केंद्र सरकार की भूमिका भी अहम होगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस विवाद का समाधान बातचीत से निकलता है या यह मामला एक बार फिर केंद्र–राज्य संबंधों में तनाव की नई मिसाल बनता है।