हिमाचल प्रदेश — पूर्व केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और हमीरपुर से लोकसभा सांसद श्री अनुराग सिंह ठाकुर को विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का सदस्य नियुक्त किया गया है। यह विधेयक देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में संरचनात्मक सुधार लाने के उद्देश्य से प्रस्तावित है, जिसके तहत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को समाप्त कर विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (वीबीएसए) की स्थापना का रोडमैप तैयार किया जाना है।
इस महत्वपूर्ण समिति की अध्यक्षता आंध्र प्रदेश के राजमुंद्री से लोकसभा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. डी. पुरंदेश्वरी कर रही हैं। लोकसभा और राज्यसभा के कुल 31 सदस्यों वाली यह जेपीसी विधेयक के प्रत्येक प्रावधान की गहन समीक्षा करेगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रस्तावित ढांचा राष्ट्रीय शिक्षा सुधारों, गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा, शोध, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लक्ष्यों के अनुरूप हो।
हिमाचल प्रदेश के लिए यह नियुक्ति विशेष महत्व रखती है, क्योंकि श्री अनुराग सिंह ठाकुर की भागीदारी से राज्य की शैक्षिक प्राथमिकताओं, क्षेत्रीय संतुलन और युवाओं के हितों की प्रभावी पैरवी राष्ट्रीय मंच पर सुनिश्चित होगी। उच्च शिक्षा में नीति-निर्माण के इस निर्णायक चरण में उनकी भूमिका विधेयक को व्यावहारिक, पारदर्शी और परिणामोन्मुख बनाने में सहायक मानी जा रही है।
वर्तमान में श्री अनुराग सिंह ठाकुर स्टील, कोयला एवं खान की संसदीय समिति के चेयरमैन हैं और संसद की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) के सदस्य के रूप में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इसके अतिरिक्त, वे 130वें संविधान संशोधन विधेयक, 2025, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 तथा संघ शासित प्रदेशों की सरकार (संशोधन) विधेयक, 2025 की जांच के लिए गठित संयुक्त संसदीय समितियों के भी सदस्य हैं। यह तथ्य संसद में उनकी बहुआयामी जिम्मेदारियों और विधायी अनुभव को रेखांकित करता है।
शिक्षा क्षेत्र के जानकारों के अनुसार, वीबीएसए का प्रस्ताव उच्च शिक्षा में नियामक सुधार, संस्थागत स्वायत्तता, गुणवत्ता मानकों के आधुनिकीकरण और शोध-नवाचार को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। ऐसे में श्री अनुराग सिंह ठाकुर जैसे अनुभवी सांसद की जेपीसी में मौजूदगी विधेयक को संतुलित, छात्र-केंद्रित और राष्ट्रहितैषी बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
कुल मिलाकर, यह नियुक्ति न केवल हिमाचल प्रदेश केंद्रित राजनीतिक महत्व रखती है, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा सुधार एजेंडा में राज्य की सशक्त भागीदारी का संकेत भी देती है।





