आरडीजी पर टकराव: हिमाचल के अधिकार बनाम केंद्र का फैसला, सर्वदलीय बैठक में BJP का वॉकआउट और सियासी सवाल

हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति और राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को लेकर बुलाई गई सुक्खू सरकार की सर्वदलीय बैठक प्रदेश की राजनीति में बड़े टकराव का कारण बन गई। राजधानी में हुई इस बैठक का उद्देश्य राज्य के गंभीर आर्थिक हालात पर सभी दलों से सुझाव लेना था, लेकिन बैठक के बीच ही भाजपा नेताओं द्वारा वॉकआउट किए जाने से पूरा विमर्श राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदल गया। नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल समेत भाजपा प्रतिनिधिमंडल के बाहर निकलने के बाद कांग्रेस और वाम दलों ने सीधे तौर पर भाजपा और केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए।

भाजपा का आरोप था कि सर्वदलीय बैठक राजनीतिक उद्देश्य से बुलाई गई और इसमें राज्य के आर्थिक संकट का ठीकरा केंद्र सरकार पर डालने की कोशिश की गई। जयराम ठाकुर ने कहा कि सरकार की ओर से दी गई प्रस्तुति में कई तथ्य भ्रामक थे और शब्दों का चयन भी आपत्तिजनक था। उनका कहना था कि पहले दिन से ही माहौल ऐसा नहीं था कि सभी दल मिलकर हिमाचल के हित में समाधान निकालें। भाजपा अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने भी आरोप लगाया कि राज्य सरकार हर मुद्दे पर मोदी सरकार को कोसने में लगी हुई है और बैठक को केवल राजनीतिक मंच बनाया गया।

इसके उलट, सुक्खू सरकार और अन्य दलों ने भाजपा के रुख को प्रदेश हित से विमुख बताया। संसदीय कार्य एवं उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने कहा कि भाजपा नेताओं ने बैठक में केवल दोषारोपण किया और किसी ठोस समाधान पर चर्चा नहीं की। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सुनियोजित तरीके से बैठक में आई और राजनीतिक ड्रामा कर बाहर निकल गई। कांग्रेस विधायक कुलदीप राठौर ने भाजपा के व्यवहार को निंदनीय बताते हुए कहा कि सरकार का पक्ष और मुख्यमंत्री की बात तक नहीं सुनी गई, जबकि जनता के दबाव में भाजपा नेता बैठक में आए थे।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने पूरे घटनाक्रम को हिमाचल के अधिकारों से जोड़ते हुए कहा कि आरडीजी कोई दलगत मुद्दा नहीं, बल्कि प्रदेश के 75 लाख लोगों का अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने स्पष्ट नहीं किया कि वह आरडीजी पर प्रदेश के साथ खड़ी है या नहीं। मुख्यमंत्री के अनुसार, भाजपा ही सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग कर रही थी और स्थान को लेकर भी वही आग्रह कर रही थी, लेकिन जब मूल मुद्दे पर बात करने का समय आया तो भाजपा पीछे हट गई। उन्होंने पूर्व भाजपा सरकार पर भी निशाना साधते हुए कहा कि जयराम ठाकुर के कार्यकाल में ही हिमाचल कर्ज के जाल में फंसा और अगर केंद्र से समय पर सहयोग मिलता तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती।

इस पूरे विवाद के केंद्र में आरडीजी का वह फैसला है, जिसे भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने रोका हुआ है। भाजपा का तर्क है कि यह निर्णय वित्तीय अनुशासन और संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत लिया गया है। इसी संदर्भ में हिमाचल के वरिष्ठ भाजपा नेताओं और पूर्व मुख्यमंत्रियों प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार के पुराने बयानों और विचारों को भी सामने रखा जा रहा है, जिनमें उन्होंने वित्तीय संतुलन और केंद्र-राज्य संबंधों में मर्यादा की बात कही थी। भाजपा का दावा है कि केंद्र का कदम सही है और राज्यों को अपने संसाधन बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।

लेकिन यहीं से बड़ा सवाल खड़ा होता है। हिमाचल जैसे पहाड़ी और छोटे राज्य, जहां उद्योग, बड़े बाजार और वैकल्पिक राजस्व स्रोत सीमित हैं, वहां क्या आरडीजी रोकना व्यावहारिक और न्यायसंगत कदम है? माकपा नेता और पूर्व विधायक राकेश सिंघा ने कहा कि यह मुद्दा किसी पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश का है। उन्होंने भाजपा के बैठक से बाहर जाने को अपरिपक्वता करार देते हुए कहा कि वित्त आयोग को संवैधानिक आधार पर राज्यों के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए। उनके मुताबिक, आरडीजी हिमाचल का अधिकार है और राज्य पहले से ही अपने संसाधनों पर सेस लगाने में असमर्थ है, ऐसे में केंद्र का रवैया जनविरोधी है।

राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अब एक और सवाल तेजी से उभर रहा है। अगर भविष्य में हिमाचल में भाजपा सत्ता में आती है, तो क्या वही आरडीजी, जिसे आज रोका जा रहा है, फिर से बहाल किया जाएगा? अगर ऐसा होता है, तो क्या इसे केवल सुक्खू सरकार को कमजोर करने या गिराने की रणनीति के तौर पर देखा जाएगा? कांग्रेस और वाम दलों का आरोप है कि आरडीजी रोकने के पीछे आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक मंशा है, ताकि राज्य सरकार पर दबाव बनाया जा सके।

सर्वदलीय बैठक में माकपा और आम आदमी पार्टी ने जहां प्रदेश हित में सुझाव दिए, वहीं भाजपा की चुप्पी और वॉकआउट ने आरडीजी पर उसके स्पष्ट रुख को लेकर संदेह और गहरा दिया है। हिमाचल की आर्थिक स्थिति, सीमित राजस्व संसाधन और बढ़ते कर्ज के बीच आरडीजी का सवाल अब केवल वित्तीय नहीं, बल्कि राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक बन गया है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और क्या हिमाचल को उसके अधिकारों के अनुरूप राहत मिल पाती है, या यह टकराव राज्य की राजनीति को और तेज करेगा।