शिमला। । हिमाचल प्रदेश सचिवालय परिसर में ऐतिहासिक एलर्सली भवन के साथ किए गए नए निर्माण को लेकर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। मामला मुख्यमंत्री के नए कार्यालय के लिए बनाए गए एलर्सली फेज-II भवन से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि ऐतिहासिक भवन के आसपास निर्माण करते समय जरूरी नियमों और अनिवार्य setback का पालन नहीं किया गया तथा निर्माण से विरासत भवन के मूल स्वरूप और उसके आसपास के क्षेत्र पर असर पड़ा है।
हाईकोर्ट में यह मामला जनहित याचिका के माध्यम से पहुंचा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने राज्य सरकार से जवाब मांगा था। याचिका में एलर्सली भवन के आसपास हुए निर्माण, उससे संबंधित स्वीकृतियों और विरासत से जुड़े नियमों के अनुपालन को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सोमवार को एलर्सली फेज-II के नए ब्लॉक और मुख्यमंत्री कार्यालय का उद्घाटन कर दिया। नए भवन में मुख्यमंत्री कार्यालय के अलावा मुख्य सचिव और प्रधान सचिव वित्त सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के कार्यालयों की व्यवस्था की गई है।
ऐतिहासिक एलर्सली भवन के ठीक साथ नया निर्माण
एलर्सली भवन शिमला की ब्रिटिशकालीन विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह भवन 1886 में लेफ्टिनेंट कर्नल एच.एस. एबॉट द्वारा डिजाइन किया गया था और लंबे समय से हिमाचल प्रदेश सचिवालय के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। राज्य के पहले मुख्यमंत्री डॉ. वाई.एस. परमार से लेकर रामलाल ठाकुर, शांता कुमार, वीरभद्र सिंह, प्रेम कुमार धूमल और जयराम ठाकुर तक कई मुख्यमंत्री इसी ऐतिहासिक परिसर में स्थित पुराने मुख्यमंत्री कार्यालय का इस्तेमाल करते रहे हैं।
वर्तमान विवाद का केंद्र यह है कि इस ऐतिहासिक भवन के बिल्कुल समीप आधुनिक शैली में नया निर्माण किया गया है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि नए निर्माण ने न केवल विरासत परिसर के स्वरूप को प्रभावित किया है, बल्कि निर्माण के दौरान लागू setback और अन्य नियामकीय आवश्यकताओं के पालन को लेकर भी सवाल हैं।
याचिका में निर्माण और भवन में किए गए बदलावों से संबंधित जानकारी भी मांगी गई थी। इसके लिए सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत संबंधित रिकॉर्ड तथा Heritage Cabinet Sub-Committee से जुड़ी जानकारी हासिल करने का प्रयास किया गया था। इसके बाद मामला न्यायिक जांच के दायरे में आया।
करीब 20 करोड़ की लागत से तैयार हुआ नया CMO
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सोमवार को नए कार्यालय का उद्घाटन करते हुए बताया कि इस सुविधा के निर्माण पर करीब 20 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। नए कार्यालय परिसर में लगभग 15 कमरे हैं।
नए परिसर में मुख्यमंत्री के साथ उनके प्रधान सचिव, अतिरिक्त निजी सचिव और उनके स्टाफ के लिए कार्यालय बनाए गए हैं। विधायकों के बैठने और मुख्यमंत्री से मिलने आने वाले लोगों के लिए भी व्यवस्था की गई है। इसके अलावा मुख्य सचिव और वित्त सचिव के कार्यालय भी इसी परिसर में रखे गए हैं।
परिसर में करीब 40 वाहनों की पार्किंग की व्यवस्था होने की बात भी मुख्यमंत्री ने कही है। सरकार का कहना है कि इससे सचिवालय के मुख्य प्रवेश द्वार और आसपास सड़क पर खड़े वाहनों की समस्या कम होगी तथा यातायात व्यवस्था में सुधार आएगा।
मुख्यमंत्री ने कहा—यह मेरा घर नहीं, एक संस्थान है
नए कार्यालय को लेकर उठ रहे सवालों के बीच मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इसका बचाव किया है। उन्होंने कहा कि यह उनका निजी कार्यालय या घर नहीं है, बल्कि मुख्यमंत्री पद से जुड़ा संस्थागत कार्यालय है और भविष्य में किसी भी दल का मुख्यमंत्री इसका इस्तेमाल कर सकता है।
सुक्खू ने यह भी कहा कि पुराने मुख्यमंत्री कार्यालय में जगह की कमी थी और राज्य के विभिन्न हिस्सों से आने वाले लोगों, अधिकारियों तथा कर्मचारियों के लिए पर्याप्त स्थान नहीं था। नए परिसर में लोगों के बैठने और मुलाकात के लिए अधिक जगह उपलब्ध होगी।
मुख्यमंत्री ने विपक्ष द्वारा निर्माण को फिजूलखर्ची बताए जाने पर भी आपत्ति जताई और कहा कि भविष्य में सत्ता परिवर्तन होने पर भी नया मुख्यमंत्री इसी कार्यालय का इस्तेमाल करेगा। उन्होंने इसे किसी व्यक्ति विशेष के बजाय लोकतांत्रिक संस्था से जुड़ी सुविधा बताया।
विपक्ष ने उठाया खर्च और जरूरत पर सवाल
नए कार्यालय को लेकर राजनीतिक विवाद भी सामने आया है। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने राज्य की वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए करीब 20 करोड़ रुपये के खर्च पर सवाल उठाया है। उन्होंने यह भी कहा कि जब पूर्व मुख्यमंत्री ऐतिहासिक एलर्सली भवन में स्थित कार्यालय का इस्तेमाल करते रहे, तो नए कार्यालय के निर्माण की जरूरत क्या थी।
जयराम ठाकुर के अनुसार, नए मुख्यमंत्री कार्यालय का प्रस्ताव उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान भी सामने आया था, लेकिन विरासत संबंधी कारणों से उसे आगे नहीं बढ़ाया गया। यह उनका राजनीतिक दावा है, जिसकी पुष्टि का प्रश्न मौजूदा न्यायिक कार्यवाही और संबंधित सरकारी रिकॉर्ड के संदर्भ में देखा जाना है।

हाईकोर्ट के सामने अब किन सवालों पर जवाब जरूरी
इस मामले में हाईकोर्ट का रुख केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि नया कार्यालय बनाया गया या नहीं। मुख्य सवाल निर्माण की प्रक्रिया, संबंधित स्वीकृतियों और ऐतिहासिक परिसर में लागू नियमों के अनुपालन से जुड़े हैं।
याचिका में खास तौर पर यह सवाल उठाया गया है कि क्या ऐतिहासिक एलर्सली भवन के आसपास निर्माण करते समय आवश्यक setback और अन्य भवन नियमों का पालन किया गया। इसके साथ यह भी जांच का विषय है कि निर्माण के लिए संबंधित विरासत और प्रशासनिक संस्थाओं से क्या-क्या मंजूरियां ली गईं और क्या निर्माण उन्हीं शर्तों के अनुरूप हुआ।
हाईकोर्ट ने फिलहाल इन आरोपों को सही नहीं माना है। अदालत ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है, इसलिए निर्माण को लेकर लगाए गए आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी। सरकार का जवाब और मामले की आगे की सुनवाई यह स्पष्ट करेगी कि निर्माण प्रक्रिया में नियमों का पालन किस स्तर तक हुआ।
निर्माण पूरा, लेकिन विवाद अभी अदालत में
इस पूरे मामले की खास बात यह है कि जिस निर्माण को लेकर कानूनी सवाल उठाए गए हैं, उसका उद्घाटन हो चुका है। मुख्यमंत्री ने 21 सितंबर को नए ब्लॉक में कार्यालय का शुभारंभ कर दिया। दूसरी ओर, जनहित याचिका के कारण इस निर्माण का नियामकीय और विरासत संबंधी पक्ष न्यायिक जांच के अधीन है।
मुख्यमंत्री ने खुद भी हाईकोर्ट में लंबित PIL का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र में किसी नागरिक को अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार है।
इस विवाद का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि शिमला का बड़ा हिस्सा अपनी ऐतिहासिक वास्तुकला और विरासत के लिए जाना जाता है। एलर्सली भवन स्वयं एक महत्वपूर्ण ब्रिटिशकालीन संरचना है। ऐसे में सरकारी उपयोग के लिए नई आधुनिक इमारत खड़ी करने और पुराने विरासत परिसर की मूल पहचान तथा नियामकीय सुरक्षा के बीच संतुलन का सवाल केवल एक कार्यालय भवन तक सीमित नहीं रहता।
अब हाईकोर्ट में राज्य सरकार का विस्तृत जवाब इस मामले की अगली दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगा। खास तौर पर निर्माण की मंजूरियां, setback नियम, विरासत संबंधी अनुमति और नए भवन के पुराने एलर्सली परिसर पर प्रभाव से जुड़े रिकॉर्ड अदालत के सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि निर्माण के दौरान सभी निर्धारित नियमों का पालन किया गया था या नहीं।




