नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में ऐसा संकट पैदा किया है, जिसका असर अब भी खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। बाढ़ और भूस्खलन में सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है, हजारों लोग लापता हैं और देश के कई हिस्सों में सड़क, पुल, बिजली तथा संचार व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। रविवार तक नेपाल और तिब्बत में मृतकों की संख्या 800 के पार पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई, जबकि 3,000 से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी है।
लेकिन इस आपदा का सबसे भयावह चेहरा उन हाइड्रोपावर परियोजनाओं के भीतर दिखाई दे रहा है, जहां सैकड़ों कर्मचारी और मजदूर सुरंगों तथा भूमिगत ढांचों में फंसे हुए हैं। बाढ़ के पानी के साथ आए मलबे ने सुरंगों के प्रवेश द्वार बंद कर दिए हैं और कई स्थानों तक पहुंचना बेहद कठिन हो गया है।
स्वतंत्र विद्युत उत्पादक संघ नेपाल (IPPAN) के अनुसार, रासुवा और नुवाकोट जिलों की नौ हाइड्रोपावर परियोजनाओं में शुरू में 898 कर्मचारियों और मजदूरों से संपर्क टूट गया था। इनमें से 361 लोगों को अब तक सुरक्षित निकाला जा चुका है, लेकिन 537 अभी भी लापता बताए जा रहे हैं।
इन आंकड़ों में सबसे बड़ा संकट 216 मेगावाट की अपर त्रिशूली-1 परियोजना में सामने आया है। यहां शुरू में 576 लोगों के संपर्क से बाहर होने की जानकारी थी और 254 लोगों को बचाया जा चुका है। करीब 300 लोगों के अभी भी सुरंग के भीतर फंसे होने की आशंका है। बचाव दल मलबा हटाकर सुरंग तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।
छह इंच के रास्ते से जिंदगी तक पहुंचने की कोशिश
बचाव अभियान की सबसे बड़ी चुनौती सुरंगों तक पहुंचना है। भारी मात्रा में मिट्टी, पत्थर और मलबा सुरंगों के प्रवेश मार्गों को बंद कर चुका है। ऐसे में बचावकर्मी बड़े रास्ते के बजाय छोटे छेद बनाकर भीतर हवा और कैमरा पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, एक सुरंग में छोटा रास्ता बनाकर ऑक्सीजन पहुंचाने की कोशिश की गई है। नेपाल सरकार और सेना का अभियान इस उम्मीद पर आधारित है कि अंदर फंसे लोग अभी जीवित हो सकते हैं। कुछ स्थानों पर सुरंग के अंदर कैमरा और ऑक्सीजन भेजने की तैयारी की गई है।
यह बचाव अभियान समय के खिलाफ दौड़ बन चुका है। अंदर मौजूद लोगों के लिए ऑक्सीजन, भोजन, पानी और चिकित्सा सहायता की उपलब्धता सबसे बड़ी चिंता है। ऊपर से लगातार खराब मौसम और भूस्खलन के खतरे ने बचाव दलों के लिए परिस्थितियों को और कठिन बना दिया है।
नेपाल सेना, पुलिस और विशेषज्ञ बचाव दल सुरंगों के मुहाने तक पहुंचने के लिए लगातार मलबा हटा रहे हैं। रविवार को बचाव दल अपर त्रिशूली परिसर में एक सुरंग के प्रवेश क्षेत्र तक पहुंचने में महत्वपूर्ण प्रगति करने में सफल हुए। करीब 180 मीटर अंदर स्थित कार्य क्षेत्र तक पहुंचना अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
सिर्फ हाइड्रोपावर परियोजनाएं नहीं, पूरा इलाका तबाह
बाढ़ का प्रभाव केवल बिजली परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। रासुवा, नुवाकोट और आसपास के हिमालयी क्षेत्रों में सड़कें, पुल, मकान और व्यापारिक प्रतिष्ठान बाढ़ और मलबे की चपेट में आए हैं।
कई गांवों का बाहरी दुनिया से संपर्क टूट गया है। जहां सड़कें बची हैं, वहां भी मलबे और क्षतिग्रस्त पुलों के कारण राहत सामग्री पहुंचाना कठिन हो रहा है। हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को निकालने और राहत सामग्री पहुंचाने के लिए किया जा रहा है।
कई इलाकों में मृतकों के शव बड़ी संख्या में बरामद होने के बाद अस्पतालों और शवगृहों पर भी दबाव बढ़ गया है। कुछ स्थानों पर शवों की पहचान करना मुश्किल हो रहा है। अधिकारियों ने DNA नमूने लेने की प्रक्रिया शुरू की है ताकि लापता लोगों के परिवारों को भविष्य में अपने परिजनों की पहचान में मदद मिल सके।
आपदा के पीछे क्या था?
26 अगस्त की तबाही अचानक आई बाढ़ और मलबे के तेज प्रवाह से शुरू हुई। शुरुआती रिपोर्टों में भूकंप की संभावना पर भी चर्चा हुई थी, लेकिन बाद के वैज्ञानिक आकलनों में हिमालयी क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर खिसकने तथा उसके बाद पैदा हुए मलबे के प्रवाह को प्रमुख कारण बताया गया।
इस घटना ने ल्हेंदे खोला, भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में अचानक भारी मात्रा में पानी और मलबा पहुंचाया। देखते ही देखते नदियों का बहाव विनाशकारी हो गया।
विशेषज्ञों ने हिमालय में बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को लेकर भी चिंता जताई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन को इस विशेष घटना का अकेला कारण बताना जल्दबाजी होगी, लेकिन गर्म होती जलवायु ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ, चट्टानों और ग्लेशियरों की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।
भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ
नेपाल की इस त्रासदी के बीच भारत ने राहत और बचाव अभियान में सहायता तेज कर दी है। भारत अब तक 68.5 टन राहत सामग्री नेपाल भेज चुका है। रविवार को 11 टन की अतिरिक्त राहत सामग्री लेकर चौथा भारतीय विमान काठमांडू पहुंचा।
भारत की सहायता केवल खाद्य और आवश्यक राहत सामग्री तक सीमित नहीं है। सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने के लिए तकनीकी विशेषज्ञों और सुरंग बचाव उपकरणों की टीम भी भेजी गई है। इसके अलावा DNA पहचान के लिए फोरेंसिक विशेषज्ञ और उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं।
बाढ़ से टूटे संपर्क मार्गों को फिर से जोड़ने के लिए भारत ने Bailey Bridge के उपकरण भी भेजे हैं। भारत की ओर से सात और ऐसे पुलों के लिए उपकरण भेजने की तैयारी की जा रही है। नेपाल ने प्रभावित क्षेत्रों में कुल 42 Bailey Bridge के निर्माण के लिए भारत और चीन से सहायता मांगी है।
10 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी बचाव अभियान में
नेपाल ने बड़े पैमाने पर सेना और सुरक्षा बलों को राहत अभियान में उतारा है। करीब 10,000 नेपाली सैनिकों और विशेषज्ञ बचाव दलों के साथ भारत और चीन से आए तकनीकी दल भी अभियान में सहयोग कर रहे हैं।
लेकिन राहत अभियान की रफ्तार को भौगोलिक परिस्थितियां लगातार प्रभावित कर रही हैं। हिमालयी इलाकों में संकरी घाटियां, टूटे रास्ते, तेज बहाव, अस्थिर पहाड़ और लगातार बारिश किसी भी बचाव अभियान को जोखिम भरा बना रहे हैं।
यही वजह है कि सुरंगों में फंसे लोगों को निकालना सबसे कठिन अभियानों में से एक बन गया है।
बाढ़ के बाद नेपाल के सामने अब पुनर्निर्माण की चुनौती
तत्काल प्राथमिकता लोगों की जान बचाना और लापता लोगों को ढूंढना है। लेकिन जैसे-जैसे पानी कम होगा, नेपाल के सामने एक और बड़ी चुनौती खड़ी होगी—पुनर्निर्माण की।
बिजली परियोजनाओं को भारी नुकसान हुआ है। सड़क और पुलों के टूटने से आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं। हजारों परिवारों के घर और आजीविका के साधन नष्ट हुए हैं।
हाइड्रोपावर क्षेत्र के लिए भी यह संकट गंभीर है। नेपाल अपनी अर्थव्यवस्था और ऊर्जा निर्यात की संभावनाओं के लिए जलविद्युत परियोजनाओं पर काफी निर्भर है। इस आपदा ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि हिमालयी क्षेत्रों में बन रही बड़ी परियोजनाओं को अत्यधिक मौसम और अचानक आने वाली बाढ़ के जोखिमों के अनुरूप कितना सुरक्षित बनाया गया है।
भविष्य में केवल नई परियोजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं होगा। मौसम और नदी प्रवाह की बेहतर निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित आपातकालीन निकासी मार्ग और सुरंगों में काम करने वाले कर्मचारियों की नियमित आपदा-प्रशिक्षण व्यवस्था भी जरूरी होगी।
लापता लोगों के परिवारों की नजर सुरंगों पर
इस पूरी त्रासदी का सबसे मानवीय पहलू उन परिवारों की बेचैनी है, जिनके प्रियजन कई दिनों से लापता हैं।
कुछ परिवारों को अब भी उम्मीद है कि सुरंगों के भीतर कोई जीवित मिल सकता है। यही उम्मीद बचाव दलों को लगातार मलबा हटाने के लिए प्रेरित कर रही है।
नेपाल की यह आपदा केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं रह गई है। यह देश की आपदा-प्रबंधन क्षमता, हिमालयी विकास मॉडल और भविष्य की जलवायु चुनौतियों की भी परीक्षा बन चुकी है।
फिलहाल हर नजर उन सुरंगों पर टिकी है, जिनके भीतर शायद कुछ जिंदगियां अब भी बची हों। एक छोटा सा रास्ता, कुछ मीटर मलबा और उसके पीछे जिंदगी की उम्मीद—नेपाल के बचाव अभियान की पूरी कहानी फिलहाल इसी संघर्ष में सिमट गई है।





