रेटा की पगडंडी से एशियन गेम्स के पोडियम तक: सीमा कुमारी ने दौड़कर बदल दी चंबा की पहचान

कभी चंबा के दुर्गम रेटा गांव की पगडंडियों पर दौड़ने वाली एक लड़की ने गुरुवार को जापान के आइची-नागोया में पूरे एशिया को अपनी रफ्तार का परिचय दिया। सीमा कुमारी ने महिलाओं की 10,000 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतकर न केवल भारत का 16 साल पुराना इंतजार खत्म किया, बल्कि हिमाचल प्रदेश के उस छोटे से गांव का नाम भी अंतरराष्ट्रीय खेल मानचित्र पर दर्ज करा दिया, जहां से उनका यह सफर शुरू हुआ था।

सीमा ने 32 मिनट 50.05 सेकेंड के समय के साथ कांस्य पदक अपने नाम किया। लेकिन इस दौड़ की असली कहानी समय से कहीं आगे है। यह उस धाविका की कहानी है जिसने शुरुआत में बढ़त बनाई, फिर रेस के बीच में पीछे हुई, लेकिन जब पदक का फैसला होने वाला था तब अपनी ताकत, रणनीति और धैर्य को फिर से जुटाया और अंतिम चरण में जोरदार वापसी करते हुए पोडियम पर जगह बना ली।

10,000 मीटर की दौड़ केवल तेज दौड़ने की परीक्षा नहीं होती। 400 मीटर के ट्रैक के 25 चक्कर। हर चक्कर में शरीर पर बढ़ता दबाव, लगातार बदलती स्थिति और अंत तक ऊर्जा बचाकर रखने की चुनौती। ऐसी दौड़ में कई बार शुरुआत की रफ्तार से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है कि खिलाड़ी अंतिम कुछ मिनटों में अपने शरीर और दिमाग को कितना नियंत्रित कर पाता है। सीमा ने नागोया में इसी धैर्य का परिचय दिया।

रेस के शुरुआती हिस्से में वह आगे चल रही थीं। बीच में उनकी स्थिति कमजोर हुई और वह पीछे खिसक गईं। लेकिन उन्होंने दौड़ को खत्म नहीं माना। अंतिम दौर में उन्होंने फिर रफ्तार पकड़ी और पदक की लड़ाई में लौट आईं। बहरीन की विनफ्रेड यावी ने 32:39.18 के समय के साथ स्वर्ण और जापान की नोजोमी तनाका ने 32:41.54 के साथ रजत पदक जीता। सीमा 32:50.05 के समय के साथ तीसरे स्थान पर रहीं।

इस कांस्य पदक का ऐतिहासिक महत्व भी कम नहीं है। महिलाओं की 10,000 मीटर दौड़ में एशियन गेम्स के स्तर पर भारत को इससे पहले 2010 में पदक मिला था, जब प्रीजा श्रीधरन ने स्वर्ण और कविता राउत ने रजत पदक जीता था। सीमा भारत की इस स्पर्धा में पदक जीतने वाली तीसरी महिला बन गई हैं और इस तरह 16 वर्षों का इंतजार समाप्त हुआ। मौजूदा एशियन गेम्स में एथलेटिक्स में यह भारत का पहला पदक भी है।

लेकिन सीमा की कहानी पदक मिलने के दिन से शुरू नहीं होती।

इसकी शुरुआत चंबा के रेटा गांव से होती है—एक ऐसा ग्रामीण परिवेश जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर के एथलीट बनने के लिए जरूरी सुविधाएं आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं। सीमित संसाधनों के बीच दौड़ने से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक पहुंचने का रास्ता लंबा था। वर्ष 2015 में सीमा का चयन भारतीय खेल प्राधिकरण के धर्मशाला केंद्र में प्रशिक्षण के लिए हुआ। बाद में वह खेलो इंडिया योजना से भी जुड़ीं। प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं के बढ़ते अवसरों ने उनकी प्रतिभा को वह मंच दिया, जहां से उनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होती गई।

इसके बाद सीमा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

2015 में जूनियर राष्ट्रीय एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 3,000 मीटर का स्वर्ण, 2018 में यूथ एशियन ओलंपिक क्वालीफिकेशन प्रतियोगिता में रजत, राष्ट्रीय खेलों में 5,000 और 10,000 मीटर में पदक, सीनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप में सफलता और 2024 की एशियन क्रॉस-कंट्री चैंपियनशिप में 10,000 मीटर का स्वर्ण—यह सफर बताता है कि नागोया की सफलता अचानक नहीं आई। यह वर्षों की तैयारी, प्रतियोगिता-दर-प्रतियोगिता अनुभव और लगातार सुधार का परिणाम है।

2025 में भी सीमा ने अपनी लंबी दूरी की क्षमता का एक और प्रमाण दिया। उन्होंने टाटा स्टील वर्ल्ड 25K में स्वर्ण पदक जीता और 25 किलोमीटर की दौड़ में 1:26:04 का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया। 2026 में एशियन गेम्स से पहले 10,000 मीटर में उन्होंने 32:02.43 का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ समय दर्ज किया था। नागोया में भले ही उनका समय व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ से थोड़ा अधिक रहा, लेकिन उस दिन उनका प्रदर्शन पदक में बदल गया—और यही बड़े मंच पर प्रदर्शन की असली कसौटी है।

सीमा की जीत की सबसे खूबसूरत तस्वीर शायद नागोया के स्टेडियम में नहीं, बल्कि चंबा के उस घर में बनी होगी जहां परिवार उनकी दौड़ देख रहा था। जैसे-जैसे आखिरी चक्कर नजदीक आया होगा, उम्मीद और चिंता दोनों बढ़ी होंगी। फिर स्क्रीन पर जब सीमा तीसरे स्थान पर दिखाई दीं, तो रेटा गांव की खुशी जापान से हजारों किलोमीटर दूर एक साथ फूट पड़ी।

उनकी मां और परिवार के लिए यह सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं है। यह वर्षों की मेहनत का वह क्षण है, जब एक बेटी ने अपने परिवार, अपने गांव, चुराह और पूरे हिमाचल को गौरवान्वित किया। स्थानीय लोगों ने भी उनकी सफलता को ग्रामीण हिमाचल की प्रतिभा के लिए प्रेरणादायक क्षण बताया है।

सीमा की उपलब्धि का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि प्रतिभा का भूगोल छोटा-बड़ा नहीं होता। अवसरों की कमी किसी खिलाड़ी की क्षमता को परिभाषित नहीं करती, हालांकि सही प्रशिक्षण और संसाधन उस प्रतिभा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। रेटा से नागोया तक का सीमा का सफर इसी सच का उदाहरण है।

और शायद इस कहानी का सबसे सुंदर अध्याय अभी बाकी है।

कांस्य पदक जीतने के बाद सीमा ने अपने अगले लक्ष्य के रूप में 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक में पदक जीतने की इच्छा जताई है। उन्होंने साफ कहा कि एशियन गेम्स की सफलता के बाद रुकना नहीं है, बल्कि ओलंपिक की तैयारी के लिए और मेहनत करनी है।

यानी रेटा की वह लड़की, जिसने नागोया में 10,000 मीटर की 25 कठिन परिक्रमाएं पूरी कर भारत का 16 साल का इंतजार खत्म किया, अब अपनी नजर उससे भी बड़े मंच पर लगाए हुए है।

चंबा की पहाड़ियों से निकली इस उड़नपरी ने एक बात साबित कर दी है—मंजिल कितनी भी दूर क्यों न हो, अगर कदम रुकें नहीं तो गांव की पगडंडी भी दुनिया के सबसे बड़े ट्रैक तक पहुंचा सकती है।

सीमा कुमारी ने सिर्फ दौड़ नहीं लगाई। उन्होंने अपने गांव की उम्मीद, अपने परिवार का सपना और हिमाचल की खेल प्रतिभा को साथ लेकर दौड़ लगाई—और नागोया में तिरंगे के साथ पोडियम पर पहुंचकर उस सफर को इतिहास में दर्ज कर दिया।