शिमला। हिमाचल प्रदेश में रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट (आरडीजी) को लेकर सियासी तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। कांग्रेस और भाजपा के बीच बयानबाज़ी अब सीधे तौर पर “भ्रम बनाम सच्चाई” की लड़ाई में बदलती दिख रही है। इसी क्रम में भाजपा प्रदेश मीडिया संयोजक कर्ण नंदा ने कांग्रेस सरकार पर कर्मचारियों और आम जनता के बीच डर का माहौल बनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा ने न तो सरकार गिराने की बात कही है और न ही वेतन, पेंशन या ओपीएस बंद होने जैसे किसी दावे का समर्थन किया है। उनके अनुसार, यह पूरा नैरेटिव कांग्रेस द्वारा राजनीतिक लाभ के लिए गढ़ा जा रहा है।
कर्ण नंदा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाजपा नेताओं और संगठन ने केवल इतना कहा है कि कार्यकर्ता हर संभावित चुनाव के लिए तैयार रहें, चाहे वह पंचायती राज संस्थाएं हों, अन्य निकाय चुनाव हों या भविष्य के विधानसभा चुनाव। इसे लोकतांत्रिक और संगठनात्मक प्रक्रिया बताते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस इसे जानबूझकर सत्ता अस्थिरता से जोड़कर पेश कर रही है, ताकि अपनी वित्तीय विफलताओं से ध्यान हटाया जा सके।
आरडीजी बंद होने के बाद मुख्यमंत्री और सरकार की बेचैनी पर सवाल उठाते हुए कर्ण नंदा ने कहा कि कांग्रेस सरकार को लगता था कि इसी ग्रांट के सहारे प्रदेश की वित्तीय गाड़ी चलती रहेगी। “आत्मनिर्भर हिमाचल” का नारा देने वाली सरकार अब आत्मनिर्भरता का ठोस रोडमैप देने के बजाय कर्मचारियों के बीच कटौती और संकट का भय फैला रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की अपनी प्रस्तुतियों और वित्त विभाग की स्लाइड्स में डीए, टीए और अन्य कर्मचारी लाभों पर संकट के संकेत दिए गए, जिनमें लगभग 13 हजार करोड़ रुपये के लाभों को लेकर अनिश्चितता दिखाई गई। यह भ्रम भाजपा ने नहीं, बल्कि सरकार ने खुद पैदा किया है।
भाजपा मीडिया संयोजक ने यह भी कहा कि आरडीजी समाप्त होने का मामला केवल हिमाचल तक सीमित नहीं है। देश के अन्य कांग्रेस शासित राज्यों ने इसे इस तरह राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया। कुछ राज्यों ने तो वित्त आयोग से स्वयं आरडीजी बंद करने का आग्रह किया था। ऐसे में सवाल उठता है कि हिमाचल कांग्रेस इसे इतना बड़ा संकट बताकर आखिर क्या संदेश देना चाहती है।
सरकार के खर्चों पर निशाना साधते हुए कर्ण नंदा ने कहा कि कठिन वित्तीय हालात में मितव्ययिता ही एकमात्र रास्ता होती है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल के कार्यकाल का उदाहरण देते हुए कहा कि उस दौर में मंत्रियों के खर्चों में कटौती, सीमित काफिले, साधारण यात्राएं और प्रशासनिक सादगी अपनाई गई थी। आज इसके उलट बड़े काफिले, बढ़ा हुआ प्रोटोकॉल, महंगे पद, चेयरमैनों के लिए अतिरिक्त सुविधाएं और बढ़ते वेतन सरकारी खजाने पर बोझ बन रहे हैं।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि चेयरमैनों और विभिन्न पदों पर दी जा रही सुविधाओं, गाड़ियों और वेतन की समीक्षा की जाए। अधिकारियों और मंत्रियों को न्यूनतम संसाधनों में अधिकतम परिणाम देने की कार्यशैली अपनानी चाहिए। साथ ही, प्रदेश की आय बढ़ाने के लिए नए और ठोस स्रोत विकसित करने होंगे। कर्ण नंदा ने कहा कि भाजपा इस दिशा में रचनात्मक सहयोग देने के लिए तैयार है, लेकिन सरकार को पहले राजनीतिक शोर से बाहर निकलकर गंभीर आत्ममंथन करना होगा।
कांग्रेस सरकार की वित्तीय रणनीति पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि जो भी बातें सामने आ रही हैं, वे अधिकतर 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों का दोहराव हैं। सरकार की अपनी कोई नई और ठोस वित्तीय नीति नजर नहीं आती। उन्होंने चेतावनी दी कि प्रदेश का कर्ज और वित्तीय घाटा 42 प्रतिशत तक पहुंच जाना गंभीर चिंता का विषय है, जो मौजूदा सरकार की अनियंत्रित ऋण नीति का परिणाम है।
विधायकों के वेतन वृद्धि के मुद्दे पर भी कर्ण नंदा ने सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि वेतन बढ़ाने की घोषणा तो कर दी गई, लेकिन मुख्यमंत्री यह स्पष्ट करें कि बढ़ा हुआ वेतन अब तक वास्तव में कितने विधायकों के खातों में पहुंचा है। यह सरकार केवल घोषणाओं और नारों तक सीमित होकर रह गई है।
आरडीजी के बहाने शुरू हुई यह सियासी जंग अब हिमाचल की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के बीच विश्वास, वित्तीय प्रबंधन और प्रशासनिक क्षमता की सीधी टक्कर बन चुकी है। एक ओर कांग्रेस इसे केंद्र की नीतियों से जोड़कर संकट बताने में जुटी है, तो दूसरी ओर भाजपा सरकार की आर्थिक नीतियों और खर्चीले शासन मॉडल को कटघरे में खड़ा कर रही है। आने वाले दिनों में यह “शब्दों की जंग” और तेज होने के संकेत दे रही है, जिसका असर सीधे तौर पर प्रदेश की राजनीति और जनमत पर पड़ना तय माना जा रहा है।





