सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: हिमाचल प्रदेश में 31 मई से पहले हर हाल में पंचायत और शहरी निकाय चुनाव कराने के निर्देश

हिमाचल प्रदेश में लंबे समय से टलते आ रहे पंचायत और शहरी निकाय चुनावों को लेकर देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था Supreme Court of India ने एक निर्णायक और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा है कि राज्य में 31 मई 2026 से पहले हर हाल में पंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकायों के चुनाव कराए जाएं। इस आदेश के बाद प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में हलचल तेज हो गई है।

यह फैसला उस याचिका पर सुनाया गया, जिसमें Himachal Pradesh सरकार ने हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें समयबद्ध चुनाव कराने के निर्देश दिए गए थे। सुक्खू सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि प्रशासनिक, कानूनी और तकनीकी प्रक्रियाओं के कारण चुनाव कराना तत्काल संभव नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को सर्वोपरि मानते हुए स्पष्ट कर दिया कि स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का गठन संविधानिक दायित्व है और इसमें अनावश्यक देरी स्वीकार्य नहीं है।

मामले की सुनवाई Justice Surya Kant और Justice Yamalya Bagchi की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि पंचायती राज संस्थाएं लोकतंत्र की बुनियाद हैं और इनके चुनाव समय पर कराना संवैधानिक जिम्मेदारी है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी राज्य सरकार को स्थानीय निकाय चुनावों को लंबे समय तक टालने का अधिकार नहीं है, क्योंकि इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को सीमित राहत भी दी। अदालत ने यह माना कि प्रशासनिक तैयारियों के लिए कुछ समय की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन इसके बावजूद अंतिम समयसीमा तय करते हुए 31 मई 2026 को अंतिम डेडलाइन घोषित कर दी गई। यानी अब सरकार के पास कोई विकल्प नहीं है और उसे इस तारीख से पहले पंचायत और शहरी निकाय चुनाव कराने ही होंगे।

यह फैसला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर लंबे समय से असमंजस की स्थिति बनी हुई थी। आरक्षण, परिसीमन, मतदाता सूची और संरचना से जुड़े मुद्दों के कारण प्रक्रिया बार-बार अटक रही थी, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं का संचालन प्रभावित हो रहा था। कई पंचायतें और स्थानीय निकाय लंबे समय से निर्वाचित प्रतिनिधियों के बिना कार्य कर रहे थे, जिससे विकास कार्यों, योजनाओं के क्रियान्वयन और जनप्रतिनिधित्व पर असर पड़ रहा था।

राजनीतिक दृष्टिकोण से भी यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। पंचायत और शहरी निकाय चुनाव हिमाचल की राजनीति की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इन्हें विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल माना जाता है, क्योंकि इससे जमीनी स्तर पर राजनीतिक दलों की स्थिति, संगठनात्मक ताकत और जनसमर्थन का स्पष्ट संकेत मिलता है।

सुक्खू सरकार के लिए यह फैसला एक बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक चैलेंज माना जा रहा है। एक ओर जहां सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए तेजी से चुनावी प्रक्रिया शुरू करनी होगी, वहीं दूसरी ओर उसे प्रशासनिक मशीनरी, राज्य निर्वाचन आयोग, सुरक्षा व्यवस्था और संसाधनों की व्यापक तैयारी भी करनी होगी।

संवैधानिक दृष्टि से यह फैसला स्थानीय स्वशासन की अवधारणा को मजबूती देता है। पंचायती राज व्यवस्था को भारतीय संविधान ने लोकतंत्र की नींव माना है, जहां सत्ता का विकेंद्रीकरण होता है और जनता को सीधे शासन में भागीदारी का अधिकार मिलता है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश इसी संवैधानिक भावना की पुनः पुष्टि करता है।

अब पूरे प्रदेश की निगाहें राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग पर टिकी हैं कि वे इस आदेश को किस तरह लागू करते हैं। तय है कि आने वाले दिनों में हिमाचल प्रदेश में चुनावी गतिविधियां तेज होंगी और पंचायत से लेकर नगर निकाय स्तर तक राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर पहुंचेगी।

यह फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि लोकतंत्र के जमीनी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा संवैधानिक संदेश है कि स्थानीय लोकतंत्र को टालना नहीं, बल्कि सशक्त करना ही शासन का मूल उद्देश्य होना चाहिए।