राघव चड्ढा के कदम से अरविंद केजरीवाल को बड़ा सियासी झटका, पार्टी के भीतर ‘पीठ में छुरा’ जैसा वार

दो वर्षों से बढ़ती दूरी का अंत: राघव चड्ढा के बाहर जाने से आम आदमी पार्टी में गहराया संकट

आम आदमी पार्टी में अचानक सामने आया बड़ा राजनीतिक झटका दरअसल पिछले दो वर्षों से पनप रही अंदरूनी खींचतान और दूरी का परिणाम माना जा रहा है। वरिष्ठ नेता Raghav Chadha का पार्टी से अलग होना और उनके साथ कई राज्यसभा सांसदों का जाना किसी एक दिन का निर्णय नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहे मतभेदों का चरम बिंदु है।

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि इस दरार की शुरुआत वर्ष 2024 में ही दिखाई देने लगी थी, जब पार्टी के शीर्ष नेता Arvind Kejriwal को कथित भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते गिरफ्तार किया गया था। उस समय पार्टी के लगभग सभी वरिष्ठ नेता सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन चड्ढा की अनुपस्थिति ने कई सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने उस दौरान विदेश में चिकित्सकीय जांच का हवाला दिया, परंतु उनकी गैरमौजूदगी को पार्टी के भीतर अलग नजरिए से देखा गया।

इसके बाद भी कई अवसर ऐसे आए जब पार्टी नेतृत्व को उनके समर्थन की आवश्यकता थी, लेकिन चड्ढा सक्रिय भूमिका में नजर नहीं आए। विरोध प्रदर्शनों से दूरी, सार्वजनिक बयानों में संयम और रणनीतिक चुप्पी ने यह संकेत देना शुरू कर दिया था कि नेतृत्व के साथ उनके संबंध पहले जैसे नहीं रहे।

हालांकि सितंबर 2024 में विदेश से लौटने के बाद उनकी और केजरीवाल की मुलाकात ने कुछ समय के लिए यह संदेश दिया कि मतभेद खत्म हो सकते हैं, लेकिन यह स्थिति अधिक समय तक कायम नहीं रह सकी। वर्ष 2025 की शुरुआत में दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान चड्ढा की सीमित सक्रियता ने इन अटकलों को और मजबूत कर दिया। पार्टी को उस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा और यह भी माना गया कि संगठनात्मक एकजुटता में कमी इसका एक कारण रही।

स्थिति तब और स्पष्ट हो गई जब केजरीवाल और उनके करीबी सहयोगी Manish Sisodia को जेल से राहत मिली, लेकिन उस समय भी चड्ढा की ओर से कोई ठोस राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। उनकी यह चुप्पी पार्टी के भीतर गहरी असहजता का कारण बनी रही।

अंततः हाल ही में वह क्षण आया जब पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में उपनेता के पद से हटाकर Ashok Mittal को यह जिम्मेदारी सौंप दी। इसके साथ ही सदन में पार्टी की ओर से बोलने के अवसर भी उनसे लगभग समाप्त कर दिए गए। इसे राजनीतिक रूप से एक स्पष्ट संकेत माना गया कि नेतृत्व और चड्ढा के बीच दूरी अब सार्वजनिक हो चुकी है।

इसी पृष्ठभूमि में अब उनका पार्टी छोड़ना और अन्य सांसदों के साथ नई राजनीतिक दिशा अपनाना सामने आया है। यह घटनाक्रम न केवल आम आदमी पार्टी के लिए एक बड़ा संगठनात्मक झटका है, बल्कि आने वाले समय में उसके राजनीतिक भविष्य पर भी असर डाल सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा प्रकरण इस बात का उदाहरण है कि किसी भी राजनीतिक दल के भीतर लंबे समय तक अनदेखे मतभेद किस तरह अचानक बड़े संकट का रूप ले सकते हैं। अब देखना यह होगा कि पार्टी नेतृत्व इस स्थिति से कैसे उबरता है और अपनी राजनीतिक पकड़ को बनाए रखने के लिए क्या रणनीति अपनाता है।