“दलित महिलाओं को चुनाव से बाहर कर रही कांग्रेस सरकार”: कर्ण नंदा का सुक्खू सरकार पर बड़ा हमला, पंचायत चुनावों में लोकतंत्र से खिलवाड़ का आरोप

हिमाचल प्रदेश में आगामी पंचायत और शहरी निकाय चुनावों की राजनीतिक सरगर्मियों के बीच अब चुनावी प्रक्रिया, महिलाओं के अधिकारों और संवैधानिक वैधता को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश की हिमाचल प्रदेश सरकार पर पंचायत चुनावों को प्रभावित करने और अनुसूचित जाति वर्ग की महिलाओं को चुनावी प्रक्रिया से बाहर करने का गंभीर आरोप लगाया है।

भाजपा प्रदेश मीडिया संयोजक कर्ण नंदा ने एक प्रेस वार्ता में कांग्रेस सरकार पर सत्ता के दुरुपयोग और प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि प्रदेश में पंचायत चुनाव केवल स्थानीय लोकतंत्र का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि अब यह संवैधानिक अधिकारों और राजनीतिक निष्पक्षता की परीक्षा बनता जा रहा है।

कर्ण नंदा ने कहा कि पंचायत चुनावों की आधिकारिक घोषणा 29 अप्रैल 2026 को हो चुकी थी और उसी दिन से चुनावी प्रक्रिया प्रभावी हो गई थी। नामांकन प्रक्रिया 7 मई से शुरू हुई, जबकि मतदान 26, 28 और 30 मई को प्रस्तावित है। भाजपा का आरोप है कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद 8 मई को पंचायतीराज विभाग द्वारा जारी किया गया एक नोटिफिकेशन चुनावी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

भाजपा के अनुसार, इस नोटिफिकेशन के जरिए अनुसूचित जाति वर्ग की उन महिलाओं को चुनाव लड़ने से रोका जा रहा है, जिनका विवाह हिमाचल प्रदेश के बाहर हुआ है, भले ही उन्होंने विवाह अपनी ही अनुसूचित जाति श्रेणी में किया हो। भाजपा ने इसे “महिला विरोधी”, “दलित विरोधी” और “संविधान विरोधी” कदम बताया है।

कर्ण नंदा ने कहा कि कांग्रेस एक ओर महिलाओं को सम्मान और राजनीतिक भागीदारी की बात करती है, जबकि दूसरी ओर अनुसूचित जाति की महिलाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी महिला का नाम मतदाता सूची में दर्ज है और उसके पास हिमाचल प्रदेश का बोनाफाइड प्रमाण पत्र भी है, तो उसे चुनाव लड़ने से कैसे रोका जा सकता है।

उन्होंने इस मुद्दे को केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मामला बताया। भाजपा का तर्क है कि भारत के अन्य राज्यों में विवाह के बाद निवास कर रही महिलाओं को स्थानीय चुनावों में भाग लेने का अधिकार मिलता है, लेकिन हिमाचल में लागू की गई यह शर्त महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों को सीमित करती है।

प्रेस वार्ता में भाजपा ने सिरमौर जिले के नाहन क्षेत्र से जुड़ी अनुसूचित जाति वर्ग की महिला अनुरानी का मामला प्रमुखता से उठाया। भाजपा के अनुसार अनुरानी की शादी वर्ष 2009-10 में हरियाणा के यमुनानगर से हिमाचल प्रदेश के काला अंब स्थित वाल्मीकि परिवार में हुई थी। उनके तीन बच्चे हैं और उनके पास हिमाचल प्रदेश का बोनाफाइड प्रमाण पत्र भी मौजूद है। बावजूद इसके, उनका नामांकन कथित तौर पर इसी नोटिफिकेशन के आधार पर रद्द कर दिया गया।

कर्ण नंदा ने बताया कि भाजपा इस मामले को लेकर उच्च न्यायालय भी पहुंची थी। हालांकि अदालत ने चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने का हवाला देते हुए तत्काल हस्तक्षेप से इनकार कर दिया, लेकिन भाजपा अब इस मामले को बड़ी पीठ के समक्ष उठाने की तैयारी कर रही है। उन्होंने कहा कि पार्टी इस मुद्दे पर “कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर” लड़ाई जारी रखेगी।

भाजपा ने इस पूरे विवाद को पंचायत चुनावों से जोड़ते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार प्रशासनिक फैसलों के जरिए विपक्ष समर्थित उम्मीदवारों को रोकने और “अपने लोगों” को लाभ पहुंचाने की कोशिश कर रही है। कर्ण नंदा ने कहा कि प्रदेश में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां महिलाओं को चुनाव लड़ने से रोका गया है और यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक मानसिकता का संकेत है।

उन्होंने कांग्रेस पर महिलाओं को आर्थिक सहायता के वादों और वास्तविक राजनीतिक अधिकारों के बीच विरोधाभास का आरोप भी लगाया। भाजपा नेता ने कहा कि सरकार महिलाओं को ₹1500 देने जैसे वादों के जरिए राजनीतिक संदेश देती है, लेकिन जमीनी स्तर पर उन्हें लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।

हिमाचल प्रदेश में पंचायत और नगर निकाय चुनावों को लेकर राजनीतिक माहौल पहले से ही गर्म है। राज्य में स्थानीय चुनाव केवल विकास और प्रशासन का मुद्दा नहीं रहते, बल्कि वे अक्सर बड़े राजनीतिक संदेशों और जनभावनाओं का संकेत भी बन जाते हैं। ऐसे में भाजपा इस मुद्दे को ग्रामीण क्षेत्रों और अनुसूचित जाति समुदायों तक पहुंचाने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत चुनावों के दौरान महिलाओं और दलित वर्ग के अधिकारों का मुद्दा चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकता है, विशेषकर तब जब स्थानीय स्तर पर सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी को लेकर संवेदनशीलता बढ़ रही हो।

फिलहाल कांग्रेस सरकार की ओर से इन आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन भाजपा ने संकेत दे दिए हैं कि वह इस मुद्दे को केवल अदालतों तक सीमित नहीं रखेगी, बल्कि इसे चुनावी मैदान में भी प्रमुख मुद्दे के रूप में उठाएगी। पंचायत चुनावों की ओर बढ़ते हिमाचल में अब यह विवाद केवल एक नोटिफिकेशन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह लोकतांत्रिक अधिकारों, सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक विश्वास की बड़ी बहस का हिस्सा बन चुका है।