हिमाचल में ईवीएम विवाद पर सियासत तेज, अनुराग ठाकुर का मुख्यमंत्री सुक्खू पर तीखा प्रहार

हिमाचल प्रदेश की राजनीति में इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच टकराव को तेज कर दिया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद अनुराग सिंह ठाकुर ने मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के हालिया बयान पर कड़ा पलटवार करते हुए इसे विपक्ष की “हताशा और निराशा” का प्रतीक बताया है। पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों में चुनाव परिणामों के बाद उठे इस विवाद ने प्रदेश की राजनीतिक बहस को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ दिया है।

अनुराग ठाकुर ने अपने बयान में कहा कि लोकतंत्र में चुनावी हार-जीत को स्वीकार करना राजनीतिक परिपक्वता का हिस्सा होता है, लेकिन विपक्ष बार-बार अपनी हार के बाद संस्थाओं और चुनावी प्रक्रियाओं पर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने कहा कि यह प्रवृत्ति न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है, बल्कि जनता के जनादेश का भी अपमान है। उनके अनुसार, “राजनीतिक संघर्ष विचारों और जनसमर्थन से लड़ा जाता है, न कि संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करके।”

उन्होंने मुख्यमंत्री सुक्खू के उस बयान पर भी सवाल उठाया जिसमें ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर संदेह जताया गया था। ठाकुर ने इसे विरोधाभासी रुख बताते हुए कहा कि जिन चुनावी प्रक्रियाओं के माध्यम से कांग्रेस शासित राज्य बने हैं, उन्हीं प्रक्रियाओं पर भाजपा की जीत के बाद प्रश्न उठाना राजनीतिक द्वंद्व को दर्शाता है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि एक ही प्रणाली से विभिन्न राज्यों में अलग-अलग परिणाम आते हैं, तो चयनात्मक रूप से संदेह जताना उचित नहीं ठहराया जा सकता।

राजनीतिक बयानबाजी को और धार देते हुए अनुराग ठाकुर ने विपक्ष पर “दोहरा चरित्र” अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जहां विपक्ष को जीत मिलती है, वहां चुनावी प्रक्रिया पर कोई प्रश्न नहीं उठाया जाता, जबकि हार के बाद वही प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ जाती है। इस संदर्भ में उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है, न कि लगातार संस्थाओं पर आरोप लगाने की।

केंद्रीय स्तर पर किए गए चुनावी सुधारों का उल्लेख करते हुए ठाकुर ने कहा कि बीते वर्षों में चुनाव आयोग ने मतदान प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सशक्त बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि मतदाताओं के अधिकारों को मजबूत करने के लिए किए गए सुधारों का स्वागत होना चाहिए, न कि उन पर संदेह किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, लोकतंत्र की मजबूती के लिए संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखना आवश्यक है।

अपने बयान के दौरान उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व पर भी अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधा और कहा कि लगातार चुनावी पराजयों के बाद भी पार्टी ने आत्मचिंतन नहीं किया है। उन्होंने यह टिप्पणी भी की कि हार के कारणों को स्वीकार करने के बजाय ध्यान भटकाने की राजनीति की जा रही है। उनकी यह टिप्पणी राजनीतिक रूप से तीखी मानी जा रही है, क्योंकि इसमें विपक्ष की रणनीति और नेतृत्व दोनों पर सवाल उठाए गए हैं।

इस पूरे विवाद ने हिमाचल प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दिया है, जहां स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श भी प्रभावी रूप से सामने आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ईवीएम जैसे संवेदनशील विषय पर बढ़ती बयानबाजी आने वाले समय में चुनावी माहौल को और अधिक ध्रुवीकृत कर सकती है।

हालांकि, इस बहस के बीच यह भी स्पष्ट है कि राज्य की राजनीति अब केवल स्थानीय विकास और प्रशासनिक मुद्दों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर चल रही वैचारिक टकराहट का भी प्रभाव इसमें दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या यह जनमत को प्रभावित करने में कोई भूमिका निभाता है।