कांगड़ा भाजपा में बढ़ी अंदरूनी तकरार, नूरपुर की सियासत में खुलकर सामने आई गुटबाज़ी

हिमाचल प्रदेश भाजपा में लंबे समय से सुलग रही अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सतह पर दिखाई देने लगी है। कांगड़ा जिले के नूरपुर और फतेहपुर क्षेत्र की राजनीति इन दिनों केवल चुनावी मुकाबले तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि यह पार्टी के भीतर नेतृत्व, प्रभाव और राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई में बदलती नजर आ रही है। नगर परिषद चुनावों में मिली हार के बाद शुरू हुआ असंतोष अब जिला परिषद चुनावों के दौरान खुली बयानबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप तक पहुंच गया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री राकेश पठानिया तथा कांगड़ा लोकसभा सांसद राजीव भारद्वाज के बीच बढ़ती तल्खी ने संगठन के भीतर चल रही गुटबाज़ी को सार्वजनिक कर दिया है।

नूरपुर में आयोजित एक पत्रकार वार्ता के दौरान पूर्व मंत्री राकेश पठानिया ने स्वयं को भाजपा का “समर्पित सिपाही” बताते हुए पार्टी और संगठन के प्रति अपनी निष्ठा दोहराई, लेकिन साथ ही क्षेत्रीय नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल भी खड़े किए। उन्होंने कहा कि राजनीति में टिकट मिलना या कटना सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन इससे किसी कार्यकर्ता का संगठन से रिश्ता समाप्त नहीं होता। पठानिया ने कहा कि भाजपा ने उन्हें पहचान और सम्मान दिया है और वे आगे भी पार्टी को मजबूत करने के लिए काम करते रहेंगे।

हालांकि उनके बयान में क्षेत्रीय विधायक और सांसद के प्रति नाराज़गी भी साफ झलकी। उन्होंने कहा कि जनता केवल राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं बल्कि ज़मीनी विकास देखना चाहती है। पठानिया ने दावा किया कि उनके कार्यकाल के दौरान नूरपुर और आसपास के क्षेत्रों में करोड़ों रुपये की विकास योजनाएं शुरू की गईं, लेकिन अब उन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के बजाय राजनीतिक विवाद का विषय बनाया जा रहा है। उन्होंने कांगड़ा घाटी की बंद पड़ी रेल सेवा को दोबारा शुरू करने की मांग उठाते हुए कहा कि क्षेत्र के बुनियादी विकास के मुद्दों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

दूसरी ओर सांसद राजीव भारद्वाज ने पार्टी विरोधी गतिविधियों और भीतरघात को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाजपा अनुशासन और संगठन की विचारधारा पर चलने वाली पार्टी है और संगठन के खिलाफ जाकर अलग उम्मीदवार उतारना सीधा-सीधा अनुशासनहीनता है। सांसद ने बिना नाम लिए उन नेताओं पर निशाना साधा जो जिला परिषद चुनावों में पार्टी समर्थित उम्मीदवारों के खिलाफ अपने प्रत्याशी मैदान में उतार रहे हैं।

राजीव भारद्वाज ने कहा कि भाजपा कार्यकर्ताओं की मेहनत और समर्पण से खड़ी हुई पार्टी है और निजी महत्वाकांक्षाओं के कारण संगठन को कमजोर करने वालों को जनता कभी माफ नहीं करेगी। उन्होंने संकेत दिए कि पार्टी नेतृत्व इस पूरे मामले को गंभीरता से देख रहा है और अनुशासन समिति ऐसे मामलों में कार्रवाई कर सकती है। सांसद के इस बयान को सीधे तौर पर राकेश पठानिया खेमे के खिलाफ संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

सांसद के बयान के बाद राकेश पठानिया ने भी पलटवार करते हुए कहा कि किसी को भी उनकी निष्ठा पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि जनता सब देख रही है और समय आने पर सही जवाब भी देगी। पठानिया ने दावा किया कि उन्होंने हमेशा संगठन को मजबूत करने का काम किया है और उन्हें पार्टी विरोधी बताने की कोशिश राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित है।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कांगड़ा भाजपा में यह संघर्ष केवल व्यक्तिगत बयानबाज़ी नहीं बल्कि भविष्य की राजनीतिक ज़मीन तैयार करने की लड़ाई भी है। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में कांगड़ा जिला हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। विधानसभा चुनावों से लेकर लोकसभा चुनावों तक, राज्य की सत्ता की दिशा तय करने में कांगड़ा की राजनीतिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में भाजपा के भीतर बढ़ती गुटबाज़ी पार्टी के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।

नगर परिषद, निकाय और हालिया स्थानीय चुनावों में भाजपा को जिन क्षेत्रों में अपेक्षित सफलता नहीं मिली, वहां अब हार की समीक्षा के बजाय एक-दूसरे पर आरोप लगाने का दौर शुरू हो गया है। संगठन के भीतर कई खेमों के सक्रिय होने की चर्चा लगातार राजनीतिक गलियारों में सुनाई दे रही है। वरिष्ठ नेताओं के बीच बढ़ती दूरी और स्थानीय स्तर पर समन्वय की कमी ने कार्यकर्ताओं के भीतर भी असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी दल के लिए चुनावी हार आत्ममंथन का अवसर होती है, लेकिन यदि हार के बाद संगठनात्मक एकजुटता कमजोर होने लगे तो इसका असर भविष्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है। हिमाचल प्रदेश में भाजपा फिलहाल सत्ता से बाहर है और ऐसे समय में अंदरूनी मतभेदों का सार्वजनिक होना विपक्ष को राजनीतिक अवसर दे सकता है।

कांगड़ा और नूरपुर क्षेत्र में मौजूदा घटनाक्रम यह संकेत दे रहा है कि भाजपा के भीतर नेतृत्व और प्रभाव को लेकर संघर्ष आने वाले समय में और तेज हो सकता है। फिलहाल पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह संगठनात्मक अनुशासन बनाए रखते हुए नाराज़ नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चले, क्योंकि हिमाचल की राजनीति में कांगड़ा की दिशा अक्सर सत्ता का रास्ता तय करती है।