हरियाणा, जिसे पिछले कुछ वर्षों में विकास, औद्योगिक विस्तार और सामाजिक सुधारों के लिए जाना जा रहा है, आज एक बार फिर एक गंभीर सामाजिक संकट के केंद्र में खड़ा दिखाई देता है। वर्ष 2026 के पहले चार महीनों—जनवरी से अप्रैल—के दौरान जन्म के समय लिंगानुपात (Sex Ratio at Birth – SRB) का आंकड़ा गिरकर 895 तक पहुंच जाना राज्य के लिए गहरी चिंता का विषय बन गया है। इसका अर्थ है कि हर 1000 लड़कों के मुकाबले केवल 895 लड़कियां जन्म ले रही हैं। यह स्थिति न केवल पिछले वर्ष 2025 के 925 के आंकड़े से काफी नीचे है, बल्कि यह उस सामाजिक असंतुलन की ओर भी इशारा करती है, जो लंबे समय में गंभीर परिणाम ला सकता है।
इस गिरावट को लेकर राज्य सरकार भी सक्रिय हुई है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव सुमिता मिश्रा की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई, जिसमें स्वास्थ्य विभाग, पुलिस प्रशासन और जिला अधिकारियों को शामिल किया गया। बैठक में स्पष्ट निर्देश दिए गए कि अवैध लिंग जांच और कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराधों में संलिप्त गिरोहों के खिलाफ सख्त और निर्णायक कार्रवाई की जाए। यह संकेत देता है कि प्रशासन समस्या की गंभीरता को समझ रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सख्ती से इस सामाजिक प्रवृत्ति को बदला जा सकता है?
जिला स्तर पर आंकड़े और भी चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। चरखी दादरी में लिंगानुपात 769 तक गिर चुका है, जो राज्य में सबसे खराब स्थिति को दर्शाता है। अंबाला (843), महेंद्रगढ़ (847), गुरुग्राम (863) और जींद (872) जैसे जिले भी इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हैं। वहीं, कुछ जिलों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई देती है, जैसे करनाल (968), फरीदाबाद (932), कुरुक्षेत्र (932), पलवल (924) और नूंह (913), लेकिन इन आंकड़ों में भी स्थिरता की कमी साफ नजर आती है।
यदि पिछले वर्ष के मुकाबले गिरावट पर नजर डालें, तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। चरखी दादरी में 2025 के 853 से गिरकर 2026 में 769 तक पहुंचना, अंबाला में 906 से 843, झज्जर में 947 से 876 और यमुनानगर में 956 से 881 तक का गिरना यह दर्शाता है कि यह समस्या अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे गहराती जा रही है। पंचकूला जैसे अपेक्षाकृत विकसित जिले में भी 966 से 901 तक की गिरावट सामाजिक मानसिकता के व्यापक प्रभाव को उजागर करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हरियाणा में लंबे समय से चली आ रही पितृसत्तात्मक सोच, पुत्र को वंश का वाहक मानने की परंपरा, और सामाजिक-आर्थिक कारण इस असंतुलन की जड़ में हैं। हालांकि सरकार द्वारा ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान चलाए गए और कई जिलों में सकारात्मक सुधार भी देखने को मिला था, लेकिन ताजा आंकड़े यह संकेत देते हैं कि इन प्रयासों को और अधिक गहराई और निरंतरता की आवश्यकता है।
यह समस्या केवल कानून या प्रशासनिक कार्रवाई से हल नहीं हो सकती। इसके लिए समाज के भीतर एक व्यापक मानसिक बदलाव की जरूरत है। शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक संवाद के माध्यम से यह संदेश देना होगा कि बेटियां केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की समान और सशक्त भागीदार हैं।
हरियाणा जैसे राज्य, जिसने खेल, शिक्षा और उद्योग के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है, वहां इस तरह का लिंग असंतुलन एक विरोधाभास को जन्म देता है। यह समय केवल आंकड़ों पर चिंता जताने का नहीं, बल्कि ठोस और दीर्घकालिक सामाजिक सुधार की दिशा में निर्णायक कदम उठाने का है।
यदि यह प्रवृत्ति इसी तरह जारी रहती है, तो आने वाले वर्षों में इसका असर सामाजिक ढांचे, विवाह संस्थान और जनसंख्या संतुलन पर व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है। ऐसे में यह जरूरी है कि सरकार, समाज और प्रत्येक नागरिक मिलकर इस चुनौती का सामना करें और एक संतुलित, समान और संवेदनशील समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें।





