हिमाचल में बिजली पर नया ‘सेस’: होटलों, निजी अस्पतालों और मॉल्स पर बढ़ा खर्च, सुक्खू सरकार के फैसले से कारोबारी हलकों में हलचल

हिमाचल Pradesh में बिजली उपभोक्ताओं, खासकर व्यवसायिक संस्थानों के लिए अब बिजली का बिल और भारी होने जा रहा है। राज्य की हिमाचल प्रदेश सरकार ने व्यवसायिक श्रेणी के चुनिंदा उपभोक्ताओं पर नया उपकर (सेस) लगाने का फैसला किया है, जिसके बाद इन श्रेणियों में आने वाले उपभोक्ताओं को अब प्रति यूनिट बिजली पर अतिरिक्त एक रुपये का भुगतान करना होगा। राज्य ऊर्जा विभाग की ओर से 8 मई 2026 को जारी अधिसूचना के साथ यह फैसला तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है।

सरकार के इस निर्णय ने प्रदेश के होटल उद्योग, निजी स्वास्थ्य संस्थानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और सेवा क्षेत्र से जुड़े कारोबारियों के बीच नई बहस छेड़ दी है। ऐसे समय में जब पर्यटन सीजन शुरू होने वाला है और निजी संस्थानों की परिचालन लागत पहले से बढ़ी हुई है, बिजली पर लगाया गया यह अतिरिक्त सेस आने वाले महीनों में सेवाओं और उपभोक्ता दरों पर असर डाल सकता है।

ऊर्जा विभाग की अधिसूचना के अनुसार यह फैसला हिमाचल प्रदेश विद्युत (ड्यूटी) अधिनियम, 2009 की धारा 3-बी के तहत लिया गया है। सरकार ने सार्वजनिक हित का हवाला देते हुए उप-धारा 1 के अंतर्गत कुछ नई उपभोक्ता श्रेणियों को शामिल किया है, जिन पर अब अतिरिक्त सेस लागू होगा। जिन संस्थानों और प्रतिष्ठानों को इस दायरे में लाया गया है, उनमें बिजनेस हाउस, प्राइवेट ऑफिस, निजी अस्पताल, पेट्रोल पंप, होटल और मोटल, निजी नर्सिंग होम, निजी अनुसंधान संस्थान, निजी कोचिंग संस्थान, शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स शामिल हैं।

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि राज्य को ऊर्जा क्षेत्र में वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता है और यह कदम राजस्व बढ़ाने की दिशा में उठाया गया है। हिमाचल प्रदेश लंबे समय से बिजली उत्पादन करने वाला राज्य माना जाता रहा है, लेकिन विडंबना यह है कि हाल के वर्षों में बिजली खरीद, सब्सिडी और वितरण लागत में लगातार वृद्धि हुई है। ऐसे में सरकार पर वित्तीय दबाव भी बढ़ा है।

हालांकि विपक्ष और व्यापारिक संगठनों ने इस फैसले को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। उनका कहना है कि सरकार पहले ही महंगाई, टैक्स और संचालन लागत से जूझ रहे व्यवसायिक प्रतिष्ठानों पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है। होटल उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि इसका सीधा असर पर्यटन क्षेत्र पर पड़ सकता है, क्योंकि बिजली खर्च होटल संचालन का एक बड़ा हिस्सा होता है। गर्मियों के मौसम में एयर कंडीशनिंग, हीटिंग, लाइटिंग और अन्य सुविधाओं के कारण बिजली की खपत बढ़ जाती है, जिससे अब मासिक बिल में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी।

निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम संचालकों ने भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि स्वास्थ्य सेवाएं पहले से महंगी होती जा रही हैं और बिजली दरों में वृद्धि का असर अंततः मरीजों पर पड़ेगा। मेडिकल उपकरणों, आईसीयू, लैब और 24 घंटे बिजली आपूर्ति पर निर्भर स्वास्थ्य संस्थानों के लिए यह अतिरिक्त सेस परिचालन लागत बढ़ा देगा।

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े निजी कोचिंग संस्थान और अनुसंधान केंद्र भी इस फैसले से प्रभावित होंगे। बड़े शहरों में चल रहे कोचिंग सेंटरों में बिजली की खपत काफी अधिक होती है। ऐसे में संचालकों को आशंका है कि उन्हें फीस संरचना पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।

राजनीतिक स्तर पर भी इस फैसले को लेकर प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। विपक्ष इसे “राजस्व जुटाने की मजबूरी” और “व्यवसायिक गतिविधियों पर अतिरिक्त बोझ” बता रहा है, जबकि सरकार इसे वित्तीय संतुलन और सार्वजनिक हित से जुड़ा आवश्यक कदम बता रही है। सरकार का तर्क है कि यह सेस केवल चुनिंदा व्यवसायिक श्रेणियों पर लगाया गया है और घरेलू उपभोक्ताओं को इससे बाहर रखा गया है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि हिमाचल जैसे पर्यटन और सेवा क्षेत्र आधारित राज्य में बिजली दरों में हर बदलाव का व्यापक आर्थिक असर होता है। होटल, मॉल, अस्पताल और निजी संस्थान अपने बढ़े हुए खर्च को अक्सर उपभोक्ताओं तक पहुंचाते हैं, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से आम लोगों पर भी बोझ बढ़ सकता है।

इस फैसले के बाद अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि व्यापारिक संगठन और उद्योग जगत सरकार के साथ किस तरह की बातचीत करते हैं और क्या आने वाले समय में इस सेस को लेकर कोई राहत या पुनर्विचार की संभावना बनती है। फिलहाल इतना तय है कि हिमाचल में बिजली अब केवल एक बुनियादी सुविधा नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक बहस का नया केंद्र बनती जा रही है।