हिमाचल में पंचायत चुनाव की उलटी गिनती: हाईकोर्ट की समयसीमा से पहले आरक्षण रोस्टर जारी, सियासी और कानूनी सरगर्मी तेज

हिमाचल प्रदेश में लंबे समय से प्रतीक्षित पंचायत चुनाव अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचते दिखाई दे रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज विभाग ने हाईकोर्ट द्वारा तय समयसीमा से ठीक एक दिन पहले पंचायतों और शहरी निकायों के लिए आरक्षण रोस्टर जारी कर दिया है। इस कदम को प्रशासनिक तत्परता के साथ-साथ कानूनी दबाव के परिणाम के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि चुनाव प्रक्रिया को लेकर मामला न्यायालयों में विचाराधीन रहा है और समय पर चुनाव कराना राज्य सरकार के लिए एक संवैधानिक बाध्यता बन चुका है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रदेशभर की पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत सीटों का आरक्षण सुनिश्चित किया गया है, जो स्थानीय स्वशासन में महिला भागीदारी को सशक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसके तहत विभिन्न जिलों में वार्डों और पंचायत समिति अध्यक्ष पदों के लिए आरक्षण रोस्टर जारी किया जा रहा है। खास तौर पर कांगड़ा, मंडी और कुल्लू जैसे बड़े जिलों में यह प्रक्रिया तेजी से पूरी की जा रही है।

कांगड़ा जिले में पंचायत समिति अध्यक्ष पदों के लिए जारी रोस्टर सामाजिक संतुलन और आरक्षण नीति के मिश्रण को दर्शाता है। पंचरुखी और लंबागांव में अनुसूचित जाति वर्ग की महिलाओं के लिए अध्यक्ष पद आरक्षित किए गए हैं, जबकि इंदौरा और बैजनाथ में भी इसी वर्ग के लिए अवसर तय किए गए हैं। पालमपुर में अनुसूचित जनजाति महिला, वहीं नगरोटा बगवां और बड़ोह में अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं को प्रतिनिधित्व का अवसर मिलेगा। इसके अतिरिक्त परागपुर, रैत, नगरोटा सूरियां, फतेहपुर, धर्मशाला और नूरपुर जैसे क्षेत्रों में अध्यक्ष पद सामान्य श्रेणी के लिए खुले रखे गए हैं, जिससे व्यापक प्रतिस्पर्धा की संभावना बनी हुई है।

प्रदेश में 3600 से अधिक पंचायतों में चुनाव प्रस्तावित हैं, जिनमें से लगभग 1800 पदों के लिए रोस्टर तय करने की शक्तियां उपायुक्तों (डीसी) को सौंपे जाने को लेकर विवाद भी उत्पन्न हुआ है। इस प्रशासनिक निर्णय को अदालत में चुनौती दी गई है, जिससे चुनावी प्रक्रिया पर कानूनी अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे थे। इसके अलावा हाल ही में गठित नई पंचायतों के गठन को भी न्यायालय में चुनौती मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि चुनाव केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक व्यापक कानूनी और राजनीतिक विमर्श का विषय बन चुका है।

गौरतलब है कि प्रदेश में पंचायतों का कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त हो चुका है, जिसके बाद अंतरिम व्यवस्था के तहत प्रशासकों की नियुक्ति की गई थी। यह स्थिति लंबे समय तक जारी नहीं रह सकती थी, क्योंकि लोकतांत्रिक ढांचे में निर्वाचित प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति स्थानीय शासन की प्रभावशीलता को प्रभावित करती है। यही कारण है कि मामला हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने 31 मई से पहले चुनाव कराने के स्पष्ट निर्देश दिए।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान राज्य की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने प्राकृतिक आपदा का हवाला देते हुए चुनावों में देरी की बात कही थी। हालांकि, चुनाव आयोग ने इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया और समय पर चुनाव कराने के अपने रुख पर कायम रहा। इसी के चलते दोनों पक्षों के बीच कई बार टकराव की स्थिति भी देखने को मिली।

चुनाव आयोग ने पहले ही आचार संहिता के विशेष प्रावधान लागू करते हुए नई पंचायतों के गठन और वार्ड पुनर्सीमांकन (वार्ड बंदी) पर रोक लगा दी थी, ताकि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे। अब आरक्षण रोस्टर जारी होने के बाद यह माना जा रहा है कि चुनावी प्रक्रिया को अंतिम रूप देने की दिशा में प्रशासन ने एक बड़ा कदम उठा लिया है।

हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव केवल स्थानीय स्तर का लोकतांत्रिक अभ्यास नहीं हैं, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक दिशा और सामाजिक संरचना को भी प्रभावित करते हैं। महिलाओं और विभिन्न सामाजिक वर्गों को दिए गए आरक्षण से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि सरकार समावेशी प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दे रही है। हालांकि, कानूनी चुनौतियां और प्रशासनिक जटिलताएं इस प्रक्रिया को अभी भी संवेदनशील बनाए हुए हैं।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि न्यायालय में लंबित मामलों का क्या निष्कर्ष निकलता है और चुनाव आयोग किस समय-सारणी के तहत मतदान की घोषणा करता है। फिलहाल, रोस्टर जारी होने के साथ ही हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों की सरगर्मी तेज हो गई है और यह स्पष्ट हो गया है कि राज्य जल्द ही एक बड़े लोकतांत्रिक अभ्यास की ओर बढ़ रहा है।